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Sakranti

हिन्दू पंचांग के अनुसार सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाने को संक्रांति कहते हैं। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति की अवधि ही सौरमास है। वैसे तो कुल सूर्य सक्रान्तिया 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रांति महत्वपूर्ण हैं, जिनमें मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति हैं। प्रति माह होने वाला सूर्य का निरयण यानी राशि परिवर्तन संक्रांति कहलाता है। वर्ष में आने वाली कुल 12 संक्रांति में मेष संक्रांति का महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह समय है जब सूर्यदेव मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मेष संक्रांति को वैशाख संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है। हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में शामिल मेष संक्रांति पर दान एवं स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन नए अन्न का दान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मेष संक्रांति के दिन संक्रांति से चार घंटे पूर्व और चार घंटे बाद तक पुण्यकाल रहता है।

बिहार में इस दिन सतुआनी के रूप में मनाते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में मेष संक्रांति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ओडिशा में पना संक्रांति, तमिलनाडु में पुथांदु, पश्चिम बंगाल में पोइला बैसाख, आसाम में बोहाग बिहू, पंजाब में वैशाखी , केरल में विशु।

मेष संक्रांति का महत्व

इस पुण्यकाल में स्नान-दान और पितरों का तर्पण अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मेष संक्रांति के दिन सूर्य की उपासना के साथ-साथ गुड़ और सत्तू सेवन करने का भी विधान है। मेष संक्रांति पर भगवान शिव, भगवान विष्णु और मां काली का पूजन करें। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें।  सामान्यतया आमजन को सूर्य की मकर संक्रांति का पता है, क्योंकि इस दिन दान-पुण्य किया जाता है। इसी दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। इस संक्रांति को सजीव माना गया ।

कर्क संक्रांति का महत्व

सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश करने के कारण इसे कर्क संक्रांति कहा जाता है। यह सूर्य देव की दक्षिण यात्रा के प्रारंभ को दर्शाती है जिसे दक्षिणायन भी कहते है। माना जाता है इस दिन सूर्य देव छः माह के लिए निद्रा में चले जाते है। यहाँ हम आपको कर्क संक्रांति के दिन पुण्यकाल का शुभ समय बता रहे है। कर्क संक्रांति को किसी भी शुभ और महत्वपूर्ण नए कार्य के प्रारंभ के लिए शुभ नहीं माना जाता है। माना जाता है इस समय किये जाने वाले कार्यों में देवों का आशीर्वाद नहीं मिलता। कर्क संक्रांति को देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है जब चार महीनों के लिए देव शयन करने चले जाते है।

तुला संक्रांति का महत्व

सूर्य के कन्या राशि से तुला राशि में प्रवेश करने को तुला संक्रांति कहा जाता है। जो हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक कार्तिक महीने के पहले दिन आती है। यह संक्रांति दुर्गा महाष्टमी के दिन मनाई जाती है जिसे पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। लेकिन कुछ राज्य में जिनमे इस पर्व का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। जिनमे मुख्य उड़ीसा और कर्नाटक है। यहाँ के किसान इस दिन को अपनी चावल की फसल के दाने के आने की ख़ुशी के रूप में मनाते है। इन राज्यों में इस पर्व को बहुत अच्छे ढंग से मनाया जाता है।

तुला संक्रांति और सूर्य के तुला राशि में रहने वाले पुरे 1 महीने तक पवित्र जलाशयों में स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजन का भी विधान है। जिसमे किसान देवी लक्ष्मी को अपनी फसल से कुछ बीज उन्हें चढाते है और उनसे सालभर अच्छी फसल पाने के लिए प्रार्थना करते है। माना जाता है इस दिन देवी लक्ष्मी का परिवार सहित पूजन करने और उन्हें चावल अर्पित करने से भविष्य में कभी भी अन्न की कमी नहीं आती। इस दिन उड़ीसा में देवी लक्ष्मी तो कर्नाटक में देवी पार्वती का पूजन किया जाता है। तुला संक्रांति के दिन देवी लक्ष्मी को चावल के दाने, गेहूं के दाने जबकि देवी पार्वती को सुपारी, खजूर और चंदन और सिंदूर का पेस्ट व् चूड़ियाँ अर्पित की जाती है इस दिन कर्नाटक में नारियल को सिल्क के कपडे से ढक कर उसे फूलों की माला से सजाकर देवी पार्वती को अर्पित किया जाता है।

मकर संक्रांति का महत्व

सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। यही एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। हिंदू धर्म ने माह को दो भागों में बाँटा है- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य आत्मा का कारक है और आत्मा में परमात्मा यानि परमऊर्जा का निवास होता है। जब-तक हम आत्म-विश्वास से लबरेज नहीं होंगे तब-तक आकांक्षाओं की पूर्ति असम्भव सी प्रतीत होगी। सूर्य की उपासना से अध्यात्मिक ऊर्जा का संचरण होता है। सकारात्मक ऊर्जा से मन व तन में विशुद्धता आती है। तन व मन के शुद्ध होने पर आत्मबल में वृद्धि होती है और आत्मबल से मनोकामनाओं की पूर्ति के मार्ग प्रशस्त होते है। जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था, कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएँ या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है।

वर्ष 2018 की सक्रान्तिया 

तारीख ( तिथि )

वार

पर्व

14 जनवरी 2018

रविवार

मकर संक्रांति

13 फरवरी 2018

मंगलवार

कुम्भ संक्रांति

14 मार्च 2018

बुधवार

मीन संक्रांति

14 अप्रैल 2018

शनिवार

मेष संक्रांति

15 मई 2018

 मंगलवार

वृष संक्रांति

15 जून 2018

शुक्रवार

मिथुन संक्रांति

16 जुलाई 2018

सोमवार

कर्क संक्रांति

17 अगस्त 2018

शुक्रवार

सिंह संक्रांति

17 सितम्बर 2018

सोमवार

कन्या संक्रांति

17 अक्तूबर 2018

बुधवार

तुला संक्रांति

16 नवम्बर 2018

शुक्रवार

वृश्चिक संक्रांति

16 दिसम्बर 2018

रविवार

धनु संक्रांति

 

 

 

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu