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Astro Prediction

ज्योतिष क्या है??
 

ज्योतिष को मानने वाले जान ले कि ज्योतिष एक अपने आप में गणना व फलित की  साइंस ही है ज्योतिष आकाश मंडल में स्तिथ ग्रह व नक्षत्र पर आधारित है इनकी  स्थिति को देख कर जन्म लग्न व अन्य कुंडलिया बनाई जाती है व उन में स्थापित ग्रह व ग्रहों के नक्षत्र आदि जिन जिन राशियों में है उन कि गणना के बाद फलित से मनुष्य के जीवन के बारे में आने वाले समय कि स्थिति को जान कर उस शुभ समय को और शुभ व अशुभ समय के प्रभाव को कम करने कि स्थिति पैदा कि जा सकती है ज्योतिष को जानने कि कला में निपुण ज्योतिषी ही इसके बारे में पूर्ण रूप से बता सकते हैं अन्यथा ज्योतिष तो पूर्ण रूप से सत्य है पर बताने वाले के ज्ञान पर निर्भर करता है नहीं तो फलित में चूक होना सम्भावित है जो कि सत्य को असत्य में प्रवर्तित होते समय नही लगता शायद कई लोग इन्ही कारणों से ज्योतिष के ज्ञान को नहीं मानते हमारे शास्त्रों में ज्योतिष के ज्ञान पर बहुत कुछ लिखा है वैदिक ज्योतिष का ज्ञान हासिल करने के लिए कई ग्रंथों का स्मरण कर फलित कर के बताना चाहिए यहाँ तक कि गणना तो कम्पुटर सॉफ्टवेयर से कि जा सकती है पर किसी के बारे में फलित करना कम्पुटर सॉफ्टवेयर के बस कि बात नहीं ज्योतिष एक भविष्य को जानने कि कला है जो कि पुरातन काल से चली आ रही है भविष्य को जानने के और बहुत से ढंग हैं परन्तु वैदिक ज्योतिष सब से पुरातन व सटीक ढंग है जिस कि व्याख्या हमारे शास्त्रों में दी गयी है जिन में ऋग्वेद में सब से अधिक दिया हुआ है इस के इलावा सभी धर्मो कि पुस्तकों में इस का विवरण है I

अनादि काल से ही ज्योतिष भविष्य जानने की मुख्य विद्या के रूप में जानी जाती है। भारत सहित यूनान, मिस्र, चीन, बैबिलोनिया इत्यादि अनेक देशों के विद्वानों ने ग्रहों, तारों, तारा समूहों(नक्षत्र) के रंग, प्रकाश गति आदि से पड़ने वाले प्रभावों का काफी प्रामाणिक अध्ययन किया है। गणित का मुख्य विकास भी इसके अध्ययन के दौरान ही हुआ। इस विद्या में गणित का विशेष इस्तेमाल किया गया। खगोल विद्या का विकास ज्योतिष से ही हुआ है।

       ज्योतिष वेदों का अंग है। ज्योतिष शास्त्र को वेदों का नेत्र कहा गया है। जिस प्रकार मनुष्य की समस्त इंद्रियां व अंग होते हुए भी नेत्रों के बिना अधूरा है उसी प्रकार वैदिक शास्त्र ज्योतिष रूपी नेत्र के बिना अधूरा है। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ग्रहस्थिति का अध्ययन करके भविष्य में होने वाली घटनाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। संसार में जो भी घटित होता है वह सब एक-दूसरे से किसी ना किसी रूप में संबंधित होता है। इसी प्रकार जन्म के समय जो आकाशीय ग्रह स्थिति होती है l उसका पूर्ण प्रभाव भी जन्म लेने वाले अर्थात जातक पर पड़ता है। उस आकाशीय ग्रह स्थिति संबंधित गुण दोष उस जातक पर अपना प्रभाव डालते हैं इतना ही नहीं समय समय पर बदलती हुई आकाशीय ग्रह स्थिति से भी मनुष्य प्रभावित होता है। जिसे गोचर कुन्ड़ली कहा जाता है। जिस प्रकार ग्रीष्म काल में सूर्य के प्रभाव से उसे पसीना आ जाता है वहीं सर्दियों में वही किरणें अच्छी लगती हैं। ज्योतिष शास्त्र में महर्षियों द्वारा बनाये सिद्धांत हैं। वर्तमान काल में  ज्योतिष का प्रयोग एक दर्पण की भांति करना चाहिये। ना तो इसके अंधविश्वासी बनें और ना ही इसे उपेक्षित करें क्योंकि ज्योतिष एक विशुद्ध विज्ञान है। जो मनुष्य के भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में संकेत करने में पूर्ण-रूप से सक्षम है। ज्योतिष अर्थात ज्योति-विज्ञान, छह शास्त्रों में से एक है, इसे वेदों का नेत्र कहा गया है ऐसी मान्यता है की वेदों का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए ज्योतिष में पारंगत होना आवश्यक है महाप्रतापी त्रिलोकपति रावण जिसे चारो वेद कंठस्थ थे, ज्योतिष का सिद्ध ज्ञाता था। उसने रावण संहिता जैसा ग्रंथ रचा था जिसके बल पर उसने शनि और यमराज तक को अपना दास बना लिया था ज्योतिष ज्ञान से ही नारद त्रिकालज्ञ हुए  भगवान कृष्ण, भीष्म पितामह, कर्ण आदि महान योद्धा भी ज्योतिष के अच्छे जानकर थे।  ब्रह्मा के मानस पुत्र भृगु ने भृगुसंहिता को लिखा. छठी शताब्दी में वरामिहिर ने वृहज्जातक, वृहत्सन्हिता और पंचसिद्धांतिका लिखी, सातवी सदी में आर्यभट ने आर्यभटीय की रचना की जिस में खगोल और गणित की जानकारियाँ है। ऋषि पराशर रचित होरा शास्त्र ज्योतिष का सिद्ध ग्रन्थ है। नील कंठी वर्षफल देखने का एक अच्छा ग्रन्थ है।  मुहूर्त देखने के लिए मुहूर्त चिंतामणि एक अच्छा ग्रन्थ है। भाव प्रकाश, मानसागरी, फलदीपिका, लघुजातकम, प्रश्नमार्ग भी बहुप्रचलित ग्रन्थ है। बाल बोध ज्योतिष, और अर्थ मार्तंड अच्छी पुस्तकें है। कीरो व बेन्ह्म जैसे अंग्रेज ज्योतिषियों ने भी हस्तरेखा ज्योतिष पर भी किताबें लिखी नस्त्रेद्रम की भविष्यवाणी विश्व प्रसिद्ध है।

ज्योतिष शास्त्र के महत्वपूर्ण भागः पंचांग अध्ययन, कुंडली अध्ययन, वर्षफल अध्ययन, फलित ज्योतिष, प्रश्न ज्योतिष, हस्त रेखा ज्ञान, टैरो कार्ड ज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र ज्ञान, अंक ज्योतिष, फेंगशुई, तन्त्र मन्त्र यंत्र ज्योतिष, इसकी कई और भी विधियां है ज्योतिष को जानने के लिए जैसे पैरट ज्योतिष, प्रश्नाश्लाका, रामचरितमानस प्रश्नावली आदि।
 

 

 

 

1-मेष, 2-वृष, 3-मिथुन, 4-कर्क, 5-सिंह, 6-कन्या, 7-तुला, 8-वृश्चिक, 9-धनु, 10-मकर, 11-कुंभ, 12-मीन। प्रत्येक राशि 30 अंश की होती है। पूर्ण राशिचक्र 360 अंश का होता है।

ग्रह

लिंग

विशोंतरी दशा(वर्ष)

सूर्य

पुर्लिंग

6 वर्ष

चंद्र

स्त्रीलिंग

10 वर्ष

मंगल

पुर्लिंग

7 वर्ष

बुध

नपुंसक

17 वर्ष

बृहस्पति

पुर्लिंग

16 वर्ष

शुक्र

स्त्रीलिंग

20 वर्ष

शनि

पुर्लिंग

9 वर्ष

राहु

पुर्लिंग

18 वर्ष

केतु

पुर्लिंग

17 वर्ष

                    

राहु एवं केतु वास्तविक ग्रह नहीं हैं, इन्हें ज्योतिष शास्त्र में छायाग्रह माना गया है।

 

 

 

 

 

 

ग्रहों की आपसी मित्रता-शत्रुता इस प्रकार है...

ग्रह

मित्र

शत्रु

सम

सूर्य

चंद्र, मंगल, गुरु

शुक्र, शनि

बुध

चंद्र

सूर्य, बुध मंगल, गुरु

शुक्र

शनि

 

मंगल

सूर्य, चंद्र, गुरु

बुध

शुक्र, शनि

बुध

सूर्य

शुक्र,चंद्र

मंगल, गुरु, शनि

गुरु

सूर्य, चंद्र, मंगल

बुध,शुक्र

शनि

शुक्र

बुध, शनि

सूर्य, चंद्र, मंगल

गुरु

शनि

बुध, शुक्र

सूर्य, चंद्र, मंगल

गुरु


राशियों का स्वभाव और उनका स्वामी...
 

राशि

स्वभाव

राशि स्वामी

मेष

चर

मंगल

वृषभ

स्थिर

शुक्र

मिथुन

द्विस्वभाव

बुध

कर्क

चर

चंद्र

सिंह

स्थिर

सूर्य

कन्या

द्विस्वभाव

बुध

तुला

चर

शुक्र

वृश्चिक

स्थिर

मंगल

धनु

द्विस्वभाव

गुरु

मकर

चर

शनि

कुंभ

स्थिर

शनि

मीन

द्विस्वभाव

गुरु

 


यदि 360 डिग्री को 12 से विभाजित किया जाए तो एक राशि 30 डिग्री की होती है।

 

ग्रहो का कारकत्व

सूर्य - आत्मा ,पिता , मान-सम्मान ,प्रतिष्ठा ,नेत्र ,आरोग्यता ,प्रशासन ,मस्तिक , सुवर्ण ,गेंहू ,शक्ति मानक आदि लाल वस्तुओं का कारक है

चंद्रमा - माता ,मन ,बुद्धि ,स्त्री ,धन ,चावल ,कपास आदि श्वेत वस्त्र ,मोती, गला दाई आँख ,बाई आँख ,नाडी तंत्रादि 

मंगल - पराक्रम , बल भूमि ,भाई , सेना , अग्नि ,गुड , मुंगा , ताम्र ,चोट , दुर्घटना आदि का कारक है

बुध - यह विद्या ,वाणी ,बुद्धि ,मित्र , सुख , मातुल ,बुध -बांधव ,गणित ,शिल्प ,ज्योतिष ,चाची ,मामी , हरिवस्त्र  ,घृत, पन्ना रत्न आदि का कारक है

गुरु -यह विवेक ,बुद्धि ,मित्र , शरीर पुष्टि पुत्र  ज्ञान ,शास्त्र -धर्म ,बड़े भाई ,उदारता ,पुष्प -राग ,पीतवर्ण ,सुवर्ण ,ब्राह्मण ,मंत्री , सत्वगुण ,पति,सुख ,पौत्र,पितामह आदि का कारक है

शुक्र- आयु , वाहन ,आभूषणादि ,सांसारिक सुख ,व्यापार,कामसुख ,वीर्य ,चांदी,काव्य -रूचि  ,संगीत ,श्वेत ,वस्त्र ,चांदी , हीरा,दुग्धादि पदार्थ का कारक है

शनि - आयु ,जीवन ,मुत्युकारक ,सेवक ,दुःख ,रोग ,विपति ,शिल्प ,भैंस, केश ,तिल ,तेल ,नीलम ,लोहाआदि पदार्थो का कारक है

राहु -सर्प ,लाटरी ,गुप्त -धन ,भुत - बाधा,प्रयास ,तस्करी कम्बल,नारियल ,सप्तधान्य ,गुमेद आदि पदार्थो का कारक है

केतु - यह गुप्त शक्ति ,कठिन कार्य ,दुख, धूम्ररंग ,अति पीड़ा ,चर्मरोग ,व्रण, तन्त्र-विद्या,बकरी ,नीच जाती ,कुष्णवस्त्र ,कंबलादि, पदार्थो का कारक है

जन्म कुंडली में यदि कोई कारक ग्रह शुभ भाव में पड़ा हो या शुभ ग्रह द्वारा दृष्ट हो तो कारक ग्रह से संबंधित सुख की प्राप्ति होगी। जब कोई ग्रह अशुभ भाव में पड़ा हो अथवा पापी गृह से युक्त या दुष्ट हो तो उस ग्रह के कारकत्व से संबंधित सुख में कमी आएगी ।

द्वादश भावो  द्वारा विचारणीय विषय

कुंडली में प्रत्येक भाव का अपना अपना महत्व होता है। इन्ही द्वादश भावो में स्थिति राशियां एवं ग्रह अपना शुभआशुभ फल प्रगट करते है। द्वादश भावों में प्रत्येक भाव में विचारणीय विषयो के संबंध में लिखा है

प्रथम भावः इस भाव में मुख्य रूप से जातक का शारीरिक गठन ,स्वास्थय ,आयुपरमान, शारीरिक रूप ,वर्ण, चिन्ह जाती ,स्वभाव ,गुण ,आकृति ,सुख दुखः ,शिर ,पितामह ,जन्म ,प्रारम्भिक जीवन ,वर्तमान कालादि का विचार किया जाता है

लग्न एवं लग्नेश की स्थिति के बलाबलनुसार जातक स्वास्थ्य स्वभाव तथा व्यक्तित्व का ज्ञान किया जाता है इस भाव में मिथुन ,कन्या ,तुला ,एवं कुंभ राशि बलवान मानी जाती  है इस भाव का कारक ग्रह सूर्य है।

द्वितीय भावः शरीर की रक्षा के लिए धन अन्न ,वस्त्र द्रव्य एवं कुटुम्बदि साधनो की आवश्यकता होती है। इस कारण धन भाव भी कहते है। भाव से धन संग्रह ,परिवारिक सुख ,मित्र ,विद्या ,खाद्य पदार्थ ,वस्त्र ,मुख ,दाहिनी आँख ,नाक ,वाणी ,स्वर संगीत आदि कला ,विद्वता ,लेखन कला ,अर्जित धन ,सम्पति ,सुवर्णदि धातुओं का क्रयविक्रय आदि का विचार किया जाता है।

द्वितीय भाव को मारक स्थान भी कहते है इस भाव का कारक ग्रह ब्रहस्पति है।

तृतीय भावः इस भाव से भाई बहनो का सुख ,सहोदर, पराक्रम ,नौकर-चाकर ,साहस ,शौर्य, धैर्य, गायन ,भोगाभ्यास ,नजदीकी संबंधियो का सुख ,रेलयात्रा ,दाहिना कान ,हिम्मत ,सेना ,सेवक, माता पिता की मुत्यु ,चाचा ,मामा ,दमा ,खांसी, श्वास, भुजा, कर्ण आदि रोगो का विचार किया जाता है।तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगल है।

चतुर्थ भावः इस भाव से सुख दुख ,माता  ,स्थायी सम्पति ,मकान ,जायदाद ,भूमि ,सवारी ,चैपाया, मित्र बन्धु बांधव ,परोपकार के काम ,गृह खेत ,तालाब पानी ,नदी ,बाग ,बगीचा ,मामा ,श्वसुर ,नानी ,पेट , छाती ,आदि के रोग ,गृहस्थ्य जीवन इस भाव से किया जाता है चंद्रमा व बुध ग्रह इस स्थान के कारक है

पंचम भावः इस भाव से बुद्धि ,नीति, विद्या ,गर्भ ,संतान से सुख दुख ,गुप्त मंत्र ,शास्त्र ज्ञान ,विद्धता ,मंत्र सिद्धि , विचार  शक्ति ,लेखन कला ,लाटरी शेयर आदि आकास्मिक धन लाभ या हानि ,यश अपयश का सुख प्रबन्धात्मक योग्यता ,पूर्वजन्म की स्थिति ,भविष्य ज्ञान ,आध्यात्मिक रूचि ,मनोरंजन प्रेम संबंध ,इच्छाशक्ति ,जेठराग्नि ,गर्भाशय ,पेट ,मूत्रसह्यादि संबंधी विकारो का विचार पंचम भाव से करते है। इस भाव का कारक ग्रह ब्रहस्पति है।

षष्ठ् भाव: इस भाव से शत्रु रोग ,ऋण ,चोरी या दुर्घटना आदि की स्थिति ,दुष्टकर्म ,युद्ध ,अपयश ,मामा , मौसी ,सौतली माता से सुख दुख  ,विश्वासघात ,पाप ,कर्म ,हानि ,शव   बन्धुवर्ग से विरोध ,नाभि ,गुदा स्थान , कमर ,संबंधी रोगो का विचार षष्ट भाव से करते है शनि व मंगल भाव के कारक माने जाते है 

सप्तम भावः इस भाव से स्त्री एवं विवाह सुख ,काम वासना ,पति पत्नी संबंध ,साझेदारी के काम, व्यापार में लाभ हानि वाद विवाद, मुकदमा ,कलह ,पितामह , प्रवास ,विदेश गमन ,भाई बहन की संतान ,लघु यात्राएं ,दैनिक आय ,समझौता ,प्रत्येक शत्रु ,काम विकार ,बवासीर वस्ति ,जननेन्द्रिय संबंध गुप्त रोगो का विचार किया जाता है इस केंद्र भाव में  वृश्चिक राशि बलवान होती है इसे मारक स्थान भी कहते है इस भाव का कारक ग्रह शुक्र है

अष्ट्म भावः इस भाव से मुत्यु के कारण ,आयु ,गुप्तधन ,की प्राप्ति ,विध्न ,पुरातत्व प्रेम ,समुद्रादि द्वारा दीर्घ यात्राएं  ,पूर्व जन्म की जानकारी मृत्यु के बाद स्थिति, स्त्री से भूमि  धन आदि  का लाभ दुर्घटना ,यातना ,गुदा , अंडकोष आदि गुप्तेन्द्रिय संबंधी गुप्त रोगो एवं कष्टो ,पति या पत्नी की आयु का मान ,ताऊ ,विघ्न ,दास्य वर्ग एवं विषम परिस्थितियो का विचार अष्ट्म भाव से किया जाता है

नवम भाव: इस भाव से मानसिक वृति ,धर्म ,दान ,शील ,पुण्य ,तीर्थ यात्रा ,विद्या ,भाग्यो दय ,विदेश यात्रा ,मंत्र सिद्धि ,उत्तम विद्या ,बड़े भाई, पौत्र ,बहनोई ,भावजादि से संबंध ,धार्मिक पुर्नजन्म प्रवृति संबंधी ज्ञान ,मंदिर ,गुरुद्वारा आदि धर्म स्थल गुरु भक्ति ,यश कीर्ति एवं जंघा आदि विचार किया जाता है इस भाव का कारक ग्रह सूर्य व गुरु है।

दशम भावः इस भाव को केंद्र एवं कर्म भाव भी कहते है इस भाव से पिता का सुख दुख,  अधिकार ,राज्य प्रतिष्ठा ,पदोन्नति ,नौकरी, व्यापार, विदेश गमन, जीविका का साधन ,कार्य सिद्धि नेतृत्व ,सरकार ,सास ,वर्षा ,वायु यानादि, आकाशीय वृतांत एवं घुटनो आदि में विकारो का दशम से देखा जाता है। दशमभाव में मेष, वृष, सिंह, धनु(उत्तरार्ध),मकर राशि का पूर्वाद्ध बलवान होता है। दशम भाव के कारक ग्रह सूर्य ,बुध गुरु ,एवं शनि है।

एकादश भाव: इस भाव से लाभ आय भाई ,मित्र जामाता (जमाई) ,ऐश्वर्य सम्पति ,मोटर  -वाहन के सुख ,गुप्तधन, बड़े भाई या बड़ी बहन ,दांया कान , मांगलिक कार्य, ऐश्वर्य की वस्तु ,द्वितीय पत्नी एवं पिंडलियों का विचार 11वें भाव से करते है। इस भाव का कारकग्रह गुरू है।

दादश भाव: इसको व्यय स्थान व्यय स्थान भी कहते है इस भाव से धन हानि ,खर्च ,दान ,दंड व्यसन ,रोग, शत्रु पक्ष से हानि, बाहरी स्थानो से संबंधित नेत्र पीड़ा, फजूल खर्च ,स्त्री पुरुष, गुप्त सम्बन्ध, शयन सुख , दुख -पीड़ा बंधन (जेलादि) ,मृत्यु के बाद प्राणी की गति  मोक्ष ,कर्ज, षड्यंत्र ,धोखा ,राजकीय संकट ,शरीर में पाँव एवं तलुवों आदि का विचार किया जाता है। इस भाव का कारक ग्रह शनि है।

इसके इलावा जातक की जन्म कुंडली में और भी कुंडलिया होती है ये वर्गीय कुंडलिया लग्न कुंडली का विस्तार होती है इन से भी जातक के जीवन का फलित किया जाता है इनके नाम इस प्रकार है लग्न कुंडली ,चन्द्र कुंडली ,सूर्य कुंडली ,होरा कुंडली , द्रेष्काण  कुंडली ,चतुर्थांश  कुंडली , पंचमांश कुंडली , षष्ठांश कुंडली , सप्तमांश  कुंडली , अष्ठमांश  कुंडली , नवमांश  कुंडली , दशमांश  कुंडली , एकादशांश  कुंडली , द्वादशांश  कुंडली , षोडशांश  कुंडली , विशांश  कुंडली , चतुर्विशांश  कुंडली , सप्तविशांश  कुंडली , त्रिशांश  कुंडली , खवेदांश  कुंडली , अक्ष्वेदांश  कुंडली , षष्टयंश  कुंडली के इलावा पाद, उपपाद, मुंथादि का विचार किया जाता है 1

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja
 
Divya Jyoti Astro and Vaastu
 
Abohar & Ludhiana