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भवन निर्माण के मुख्यतः तीन अंग

भवन निर्माण के मुख्यतः तीन अंग

वैदिक काल में भवन निर्माण के मुख्यतः तीन अंग माने गए हैं, यथा मुख्य द्वार, अतिथि गृह एवं शयनकक्ष। भवन की मुख्य पहचान घर के ‘मुख्य द्वार’ से होती है, जिसमें भवन की गैलरी , आंगन आदि भी सम्मिलित होते हैं। भवन का दूसरा व महत्वपूर्ण अंग है, ‘‘अतिथि गृह’ अर्थात् बैठक, जहां आगन्तुकों को बिठाया तथा स्वागत किया जाता है। भवन का तीसरा अति महत्वपूर्ण अंग है ‘अंतःपुर; अर्थात् ‘शयन कक्ष’, जो परिवार के सदस्यों, विशेषकर स्त्रियों के लिये विशेष भाग होता है। घर या भवन के दूसरे भाग के दाहिने पाश्र्व में ‘पाकशाला’ अर्थात् ‘रसोईघर’ के निर्माण की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके उत्तर की ओर पवित्र स्थान अर्थात् देवगृह या पूजा-पाठ का कक्ष होता है। वैदिक कालीन भवन निर्माण में अत्यधिक सुगमता और सादगी होती थी। भारतीय वाङ्मय के अनुसार विश्वकर्मा को ही वास्तुशास्त्र का आचार्य माना जाता है। 
वैदिक वास्तु के वास्तु पुरुष मंडल में 45 देवता का वास बताया गया है. ऐसा माना जाता है के हमारे जीवन की सभी समस्याऍ इन्ही 45 देवता के अंतर्गत आती है. ये 45 देवता एक तरह से 45 ऊर्जा क्षेत्र है जो हमारे जीवन को प्रभावित करते है. ईशान कोण के देवता आपको बताते है. 
आज सबसे पहले बात करते है ईशान कोण में बनने वाली चार ऊर्जा जगहों की. इन्ही ऊर्जा क्षेत्रों से आप अपने जीवन की समस्याओं को पहचान सकते है. 
अदिति - इसमें सबसे पहले जिस ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है वह अदिति के नाम से जाना जाता है. ये ऊर्जा क्षेत्र हमें बांधे रखती है, एक हौसला मिलता रहता है. संयम प्रदान करने वाला ये पीले रंग का जोन जब असंतुलित होता है तो मन में एक अजीब सा डर रहता है. अगर व्यक्ति में अंदर बिना बात के घबराहट बनी रहती है तो यही जोन खराब होता है. इस जोन में अगर मंदिर होता है तो व्यक्ति को परेशानी के समय में एक शक्ति मिलती रहती है जो परेशानी से लड़ने में मदद देती है. 
दिति - अदिति के बाद उत्तर-पूर्व में उत्तर की तरफ ही एक दूसरे ऊर्जा का निर्माण होता है जिसे दिति के नाम से जाना जाता है. ये शक्ति हमे सोच देती है एक विशाल और व्यापक सोच और उसकी तरफ पहुंचने का रास्ता क्या होना चाहिए। ये जोन खराब होने पर लोग निर्णय ही नहीं ले पाते उन्हें पता ही नहीं के उन्हें क्या करना है. बस अपनी पुराणी परम्परा को घसीटते है. खुद की कोई निर्णय क्षमता नहीं होती. 
शिखी - उत्तर पूर्व दिशा में पूर्व की तरफ के पहले जोन को शिखि कहा गया है. शिखि एक सोच है जो सबको प्रभावित करे. जब हमें किसी आईडिया की जरूरत हो जो की बहुत बड़ा हो तो इस जोन का balance होना जरूरी है. किसी भी काम की शुरुआत एक तरह से शिखि से ही होती है. एक ऐसा idea जो बहुत बड़ा होता है या बड़ा बन जाता है शिखि की शक्ति के कारण ही होता है. 
पर्जन्य - शिखि के बराबर में पूर्व की तरफ पर्जन्य वास्तु की जगह बतायें गयी है. एक तरह से ये चारों जोन - अदिति, दिति , शिखि पर्जन्य एक दूसरे से जुड़े है. पर्जन्य जोन में एक तरह से हमारी जिज्ञासा शांत होती है. वेदो के अनुसार ये घर में संतान उत्पत्ति का करक भी होता है, इस जोन को वृद्धि का जोन भी कहा गया है. 
शायद यही कारण मिलता है के क्यों इस zone को सबसे खाली और साफ़ सुथरा रखने के लिए कहा जाता है क्यूंकि एक शुरुआत करने के लिए base हमें यही से मिलता है. 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja
Divya Jyoti Astro And Vaastu 
Abohar/Ludhiana
9855332140,9855319000,9852319000