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शारदीय नवरात्रि 2018 तिथि, विधि व कथाएं (Part 2)

शारदीय नवरात्रि 2018 तिथि, विधि व कथाएं (Part 2)

सातवाँ दिन

माँ कालरात्रि - नवरात्र का सातवाँ दिन माँ दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा विधि

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है।

माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए।

माँ दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा विधि

नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए, फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं।

सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें, इसके पश्चात माता कालरात्रि जी की पूजा कि जाती है। पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है।

सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है। इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है।

आठवां दिन

माँ महागौरी - नवरात्र का आठवां दिन माँ दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा विधि

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं और पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

कथा**भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।”। महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।

माँ दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा विधि

अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर या मंदिर में महागौरी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें और यंत्र की स्थापना करें। मां सौंदर्य प्रदान करने वाली हैं। हाथ में श्वेत पुष्प लेकर मां का ध्यान करें।

अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए नहीं तो 2 कन्याओं की पूजा करें। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक न हो। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए।

नौवां दिन

माँ सिद्धिदात्री - नवरात्र का नोवां दिन माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा विधि

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। वह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यह अंतिम देवी हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

भगवान शिव ने भी सिद्धिदात्री देवी की कृपा से तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।

मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

देवी पुराण में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शंकर ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। ये कमल पर आसीन हैं और केवल मानव ही नहीं बल्कि सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता और असुर सभी इनकी आराधना करते हैं। संसार में सभी वस्तुओं को सहज और सुलभता से प्राप्त करने के लिए नवरात्र के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है।

माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा विधि

दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। यह नौ दुर्गा का आखरी दिन भी होता है तो इस दिन माता सिद्धिदात्री के बाद अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है। सर्वप्रथम माता जी की चौकी पर सिद्धिदात्री माँ की तस्वीर या मूर्ति रख इनकी आरती और हवन किया जाता है। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए। बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार हवि दें। भगवान शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा पश्चात अंत में इनके नाम से हवि देकर आरती करनी चाहिए। हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया है जाता है उसे समस्त लोगों में बांटना चाहिए।

नवरात्रों में कन्या पूजन देता है शुभ फल

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हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। सनातन धर्म वैसे तो सभी बच्चों में ईश्वर का रूप बताता है किन्तु नवरात्रों में छोटी कन्याओं में माता का रूप बताया जाता है। अष्टमी व नवमी तिथि के दिन तीन से नौ वर्ष की कन्याओं का पूजन किए जाने की परंपरा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती है। छल और कपट से दूर ये कन्यायें पवित्र बताई जाती हैं और कहा जाता है कि जब नवरात्रों में माता पृथ्वी लोक पर आती हैं तो सबसे पहले कन्याओं में ही विराजित होती है।

स्त्रों के अनुसार एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो की पूजा से भोग और मोक्ष, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से राज्यपद, पांच की पूजा से विद्या, छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि,  सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा से संपदा और नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्ठमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ रहता है। कन्याओं की संख्या 9  हो तो अति उत्तम है नहीं तो दो कन्याओं से भी काम चल सकता है। कन्याओं की आयु 10 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार महामाया भगवती प्रसन्न होकर मनोरथ पूर्ण करती हैं।

आइये जानते हैं कि कैसे करनी चाहिए इस दिन कन्याओं की पूजा-

कन्याओं के पैर धो कर उन्हें आसन पर बैठाया जाता है। हाथों में मौली बांधी जाती है और माथे पर रोली से टीका लगाया जाता है। भगवती दुर्गा को उबले हुए चने,  हलवा,  पूरी,  खीर,  पूआ व फल आदि का भोग लगाया जाता है। यही प्रसाद कन्याओं को भी दिया जाता है। कन्याओं को कुछ न कुछ दक्षिणा भी दी जाती है। कन्याओं को लाल चुन्नी और चूडि़यां भी चढ़ाई जाती हैं। कन्याओं को घर से विदा करते समय उनसे आशीर्वाद के रूप में थपकी लेने की भी मान्यता है।

ध्यान रखें कि कन्याओं के साथ एक लांगूर(लोकड़) यानी लड़के का भी पूजन होता है। ऐसा कहा जाता है कि लांगूर(लोकड़) के बिना पूजन अधूरा रहता है।

नवरात्रि : राशिनुसार किस देवी का करें पूजन

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा नमोस्तुते।।

संसार की उत्पत्ति के समय से जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि, लाभ-हानि का चक्र चला आ रहा है। मनुष्य आपत्ति-विपत्ति के समय अपने इष्ट देवता, कुलदेवता, गुरु अथवा अपने पितृ देवता के शरण में जाता है।

त्रिपुर सुंदरी, राज-राजेश्वरी, ममतामयी मां दुर्गा देवी, जिनके नौ रूपों के अतिरिक्त भी अनन्य रूप है, इन रूपों में से किसी भी रूप की शरण में जाकर भक्त मां की आराधना करता है, तो मां अवश्य अपने भक्त को शरण में लेकर उसके कष्टों को दूर कर देती है, अत: भक्तों को मां के शरण में जाकर उनकी आराधना करना चाहिए। नवरात्रि में राशि अनुसार मां के किस रूप की आराधना करनी चाहिए।

* मेष राशि वाले जातक 'मां मंगला देवी' की आराधना करें।

'ॐ मंगला देवी नम:' का जाप करें।

* वृषभ राशि वाले जातक 'मां कात्यायनी' की आराधना करें।

'ॐ कात्यायनी नम:' का जाप करें।

* मिथुन राशि वाले जातक 'मां दुर्गा' की आराधना करें।'ॐ दुर्गाये नम:' का जाप करें।

* कर्क वाले जातक 'मां शिवाधात्री' की आराधना करें।

'ॐ शिवाय नम:' का जाप करें।

* सिंह राशि वाले जातक 'मां भद्रकाली' की आराधना करें।'ॐ कालरूपिन्ये नम:' का जाप करें।

* कन्या राशि वाले जातक 'मां जयंती' की आराधना करें।

'ॐ अम्बे नम:' या ''ॐ जगदंबे नम:'' का जाप करें।

* तुला राशि वाले जातक मां के 'क्षमा रूप' की आराधना करें।

'ॐ दुर्गादेव्यै नम:' का जाप करें।

* वृश्चिक राशि वाले जातक 'मां अम्बे' की आराधना करें।

'ॐ अम्बिके नम:' का जाप करें।

* धनु राशि वाले जातक 'मां दुर्गा' की आराधना करें।

'ॐ दूं दुर्गाये नम:' का जाप करें।

* मकर राशि वाले जातक मां के 'शक्ति रूप' की आराधना करें।

'ॐ दैत्य-मर्दिनी नम:' का जाप करें।

* कुंभ राशि वाले जातक 'मां चामुण्डा' की आराधना करें।

'ॐ चामुण्डायै नम:' का जाप करें।

* मीन राशि वाले जातक 'मां तुलजा' की आराधना करें।

'ॐ तुलजा देव्यै नम:' का जाप करें।

 

इन सरलतम जाप से जो भी भक्त मां भगवती की आराधना करता है, मां उस भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करती है।

नवरात्रों के नौ दिनों में नौ कामनाएं पूर्ण करें :

   नवरात्रों में आप चाहें तो इसी में नौ दिनों का विधान लिखा है. इन नौ दिनों में आप अपनी नौ मनोकामनाएं माँ दुर्गा से मनवा सकते हैं. मनवाने के लिए नौ की नौ देवियों के पूजा --पाठ क्र रात्रि में पूर्ण इनकी स्तुतियां या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें लाभ होगा .

 आप अगर शिव की भक्ति करते हैं. तो अपने दुकान, मकान या फैक्ट्री के धन वाले गल्ले में पीले कपड़े के ऊपर एकमुखी गोल या काजू दाना रुद्राक्ष रख रोजाना शिव का मंत्र करते हैं .तो धन लाभ बढ़ेगा .और सुख से दिन बीतेंगे

एक ही दिन में प्राप्त करें पूर्ण नवरात्रें का फल :

आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में हर कोई इतना गुम होता चला जा रहा है .कि उसके पास अपने लिए भी समय नहीं है .ऐसे में हम अपना नित्य नियम भी पूर्ण एकाग्रता के साथ नहीं कर पाते शास्त्र के अनुसार क्लो चण्डी विनायको का अर्थ है कि कलियुग में भक्ति उपासना ही प्रबल है. तो इसके लिए माँ दुर्गा जो चण्डी रूप है .उसके नवरात्रे से बडा मौका तो हो ही नहीं सकता समय अपनी तेज गति से चलता है हो सकता है कि आपके मन में ऋतु संधिकाल में आए नवरात्रे रखने की इच्छा भी हो परंतु किसी कारण व्रत आप नही रख पाए तो आप इस पूर्ण नवरात्रे पक्ष का फल छठे नवरात्रे की रात एक छोटा सा हवन करके ले सकते हैं. आपको माँ शक्ति से भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए अहो तेज व बाहुबल मांगना चाहिए. थोड़ी सी सूझ-बूझ से काम लें व इस मौके को हाथ से न जाने दें किसी भी यज्ञ या हवन के लिए अग्नि धुप होना जरूरी है. क्योंकि धरती पर अग्नि का वास हो तो फल यज्ञ कर्ता को मिलता है. आकाश में वास हो तो फल इन्द्र देव ले जाते हैं. व पताल में वास होने पर फल नागों को मिल जाता है .छठ की रात्रि (14/15 अक्टूबर 2018 )में मध्य रात्रि लगभग 12:00 से प्रात: 04:30 के मध्य हवन का आयोजन किसी उचित ब्राहम्णसे करवाऐं उस दिन सर्वाथ सिद्धि योग भी होगा ऐसे समय में सच्ची श्रद्धा से किए जाने वाले यज्ञ में भी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं

गृह प्रवेश शुभ मुहूर्त नवरात्रि 2018 में

नए घर में प्रवेश करने के लिए नवरात्रि की तिथि, क्या नवरात्रि में गृह प्रवेश किया जा सकता है जानें विस्तार से और ये भी जानें कब से है नवरात्रि और किस दिन या किस तिथि को गृह प्रवेश कर सकते हैं

गृह प्रवेश करना मुहूर्त के हिसाब से बहुत अच्छा होता है। पर कुछ ऐसी भी तिथियां है जिसमे आप गृह प्रवेश कर सकते हैं। कई लोग मुहूर्त को नहीं देखते सिर्फ ये देखते हैं की हमें नवरात्रि में गृह प्रवेश करना है या घर का नींव रखना है। कई लोग दीपावली में भी गृह प्रवेश करते हैं। दीपावली लक्ष्मी का त्यौहार है, और वो चाहते है की हमारे नए घर में लक्ष्मी का वास हो।

नवरात्रि और दीपावली खुशियों का त्यौहार है, एक राक्षसी ताकत को दूर करने का पर्व है तो दुसरा सुख-समृद्धि का सूचक है। नए घर में प्रवेश करने के लिए प्रकृति के सभी तत्वों का संतुलित होना बहुत आवश्यक हैं क्योंकि समृद्धि और सुख-शांति तभी आती है। और इन दिनों नवरात्रि में गृह प्रवेश करने से ये सारे तत्व, विद्यमान रहते हैं।

ऐसे तो नवरात्रि के सभी दिनों में गृह प्रवेश करना शुभ होता है, पर अष्टमी को गृह प्रवेश करना बहुत ही उचित माना जाता है। पंचमी और सप्तमी को भी आप गृह प्रवेश कर सकते हैं।

नवरात्री में किसी भी दिन शुभ महूर्त जैसे महिंद्र घटी, अमृत घटी, अभिजीत महूर्त शुभ समय में गृह प्रवेश कर सकते है अशुभ काल या अशुभ घटी ,राहु काल को छोड़ कर आप कोई भी दिन चुन सकते है.

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana