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गणनायक श्री गणेश का अर्थ एवं परिचय

गणनायक श्री गणेश का अर्थ एवं परिचय

                                                

गणनायक श्री गणेश का परिचय लिखना सूरज को दीपक दिखाने वाली बात है. क्योंकि श्री गणेश कोई सधारण देवता नही है. गणेश जी साक्षात अनंत कोटि ब्रहृाण्ड नायक जगनियंता परात्पर 'ब्रह्रा' ही है. श्री गणेश जी तैंतीस कोटि  देवी देवताओं के भी परम आराध्य है. यदि गणेश शब्द की संधि की जाए तो गणेश दो अलग अलग अक्षरों 'गण' तथा ईश से बना है. गण का अर्थ है वर्ग ' समूह समुदाय ईश का अर्थ है स्वामी शिवगण एवं देवों के स्वामी होने से उन्हें गणेश कहते है. आठ वसु , ग्यारह रूद्र और बढ़ आदित्य गण देवता कहे गए है ' गण ' शब्द व्याकरण के अंतर्गत भी आता है. व्याकरण में गण पाठ का अपना अलग ही अस्तित्व है. अक्षरों को भी गण  कहा जाता है उनके भी 'ईश' होने के कारण उन्हें गणेश कहा जाता है. श्री गणेश जी को विद्या और बुद्धि का प्रदाता भी कहा जाता है. इसके अलावा गण शब्द रूद्र के अनुचर के लिए भी आता है. संख्या विशेषावली सेना का भी बोधक शब्द गण है. गण 27 , अश्व 81 , पदातिक 135 , अर्थात 270 का समुदाय इसके स्वामी भी श्री गणेश  है. शास्त्र में भी आठ गण है. इनके अधिष्ठाता देवता होने के कारण भी इन्हें गणेश की संज्ञा दी गयी है. ज्योतिष शास्त्र में जन्म नक्षत्रों के अनुसार देव मानव तथा राक्षस, ये तीन गण है. सब प्रकार के गणों के ईश श्री गणेश जी है. इस संसार में परब्रह्रा स्वरूप भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त किसी वस्तु का अस्तित्व नही है. भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है. भगवान श्री ही श्री गणेश जी परब्रह्रा परमात्मा स्वरूप है अथवा दान - पुण्य , किसी देव देवता का पूजन करते समय ,अथवा यज्ञ करते समय सबसे पहले यदि श्री गणेश पूजन नही किया गया , तो अनेक प्रकार की विघ्न बाधाएं आ जाती है. विवाह करने, मकान बनाने, नयी दुकान खोलने में सबसे पहले उन्हें की पूजा होती है. दीपावली के दिन तो सभी हिंदू श्री गणेश जी तथा लक्ष्मी जी का पूजन करते है. प्रत्यके धार्मिक सामाजिक कार्य से पहले पूजन एक अनिवार्य कृत्य है. भारत के अलावा विश्व के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में भगवान गणेश की बड़ी मान्यता है. वहां के मुसलमान शासकों ने अपनी राष्ट्रीय मुद्रा के नोटों पर भगवान गणेश की प्रतिमा अंकित की है.

 

                        * विघ्नविनाशक है प्रथम पूज्य गणपति *

मुनियों की आज्ञा से विश्व शिव जी और पार्वती जी ने , मन में देवताओं को अनादि समझ कर तथा कोई इस बात को सुन कर शंका न करे कि गणेश जी तो शिव - पार्वती की संतान है. अभी विवाह से पूर्व ही वे कहां से आ गये.  गणेश जी का पूजन किया. सृष्टि के प्रारंभ से ही भगवान , गणपति के रूप में प्रकट हो कर, सृष्टिकर्ता ब्रह्रा के कार्य में सहायक होते आये है . क्योंकि सृष्टि के उत्पादन में आसुरी शक्तियों द्वारा विघ्न बाधा उपस्थित की जा रही थी. तभी तो हर कार्य के लिए , गणेश जी से निवेदन किया जाता है. वेदों , पुराणों , स्मृतियों में गणपति उपासना की बात होती है. यंत्र - मंत्र शास्त्र में भी गणेश जी से संबंधित कई साधनाएं मिलती है. तैंतीस कोटि देवताओं में श्री गणेश जी का सर्वप्रथम महत्व है. किसी भी देव की आराधना के आरंभ में किसी भी देव सत्कर्मानुष्ठान में , किसी भी उत्कृष्ट से उत्कृष्ट एवं साधारण से साधारण लौकिक कार्य में भी भगवान गणपति का स्मरण , उनका विधिवत अर्चन एवं वंदन किया जाता है. गणपति सामने विघ्न ठहर ही नही सकते है. जब विघ्नों ने ब्रह्रा जी से शिकायत की कि हम कहां जाएं, तो ब्रह्रा पार्वती जी से शिकायत करते है. यह बात कवि रत्नाकर के चंद में कितनी रुचिकर बन पड़ी है :

सुंड सों लुकाइ औ ' दवाइदत दीरघ सौ, दुरित, दुरूह दुख दरिद्र बिदारे देत

कहें ' रत्नाकर ' विपति फटकारै फूंकि , कुमति कुचार पै  उछारि छार डारें देत करनी बिलोकि चतुरानन गजानन की, अब सौ लोक माहि ओक उनकों उजारे देत 

श्री गणेश जी के द्वादश नामों का लोक में सर्वाधिक महत्व एवं प्रचलन है. जो व्यक्ति विद्यारंभ के समय , विवाह के समय , नगर में , नव निर्मित भवन में प्रवेश करते समय , यात्रा में , कही भी बाहर जाते समय , संग्राम के अवसर पर , अथवा किसी भी प्रकार की विपति के समय यदि श्री गणेश के बारह नामों का स्मरण करता है  तो उसके उदेश्य , अथवा मार्ग में किसी भी प्रकार का विघ्न नही आता है. 

गणेश जी की पूजा सामान्य : हरिद्रा की मूर्ति पर की जाती है. हरिद्रा में मंगलाकर्षिणी शक्ति है तथा वह लक्ष्मी का प्रतीक भी है. नारद पुराण में तो गणेश जी की सुवर्णमयी प्रतिमा बनाने का आदेश दे कर , उसके आभाव में हरिद्रा से उसे बना लेने की छूट दी गयी है. गोमय में लक्ष्मी का स्थान होने के कारण , लक्ष्मी प्राप्ति के लिए , गणेश जी की उपासना गोमय मूर्ति पर की जाती है. गणेश जी की विशेष कृपा शीघ्र पाने के लिए श्वेत अर्क की जड़ को , पुष्प नक्षत्र युक्त रविवार के दिन मंत्रोच्चारणपूर्वक , उखाड़ कर , उस जड़ से अंगूठे के बराबर की गणेश जी की मूर्ति बना कर , पंचामृत से उसका अभिषेक कर के , पूजा में रख लें इसका संकेत अग्नि पुराण के 301 वें अध्याय में भी मिलता है अगर पुष्पयुक्त रविवार अलभ्य हो , तो केवल पुष्प नक्षत्र के दिन भी , उक्त श्वेत आक की जड़ को उखाड़ कर , पूजा के लिए उसका उपयोग कर सकते है. श्री गणेश जी की लकड़ी के द्वार के उधर्व भाग में स्थापना करने पर गृह मंगलयुक्त हो जाता है. सामान्य : यदि व्यक्ति नियमित रूप से श्री नारद पुराणोक्त संकटनाशनगणेशस्तोत्रम  का प्रतिदिन पाठ करता रहे , तो जीवन के सारे अमंगल मिट जाते है और जीवन सुख - समृद्धिदायक बन जाता है. गणेह जी की पूजा उपासना में उपयोग किये जाने वाले कुछ मंत्र निम्न है : प्रणवयुक्त गणेश जी का सबीज मंत्र सर्वाधिक प्रचलित है यह मंत्र है ऊँ गं गणपतये नमः 

वैसे प्रणय ऊँ स्वयं ही गणपति रूप है और उन्हीं का यह मंत्र है गं शब्द के दोनों और प्रणव लगा , देने से जो मंत्र बनता है वह गणेश जी का प्रणव संपुटित बीज मंत्र कहलाता है जैसे ऊँ गं ऊँ गणेश जी का नाम मंत्र भी उपलब्ध है इनमें 

द्वादशाक्षर है: ऊँ नमो भवते गजाननाय सप्ताक्षर मंत्र है श्री गणेश नमः अष्टाक्षर मंत्र ऊँ श्री गणेशाय नमः अंत में संत कवि तुलसीदास जी द्वारा रचित गणपति की स्तुति दी जाती है गाइये गणपति जगबंदन संकर भवानी नंदन सिद्धि सदन, गजबदन विनायक कृपा - सिंधु, संदूर, सबलायक मोदक प्रिय, मुद्र - मंगलदाता विद्या- वारिधि, बुद्धि विधाता मांगल तुलसीदास कर जोरे बसहि राम सिय मानस मोरे इस स्तुति के नित्य गायन से घर में सुख - संपन्नता एवं आरोग्यता की वृद्धि होती है  

 

* चंद्रमा से जुड़ा मान- अपमान 

कहते है भगवान गणेश , गणपति बनने के बाद एक दिन स्वर्ग में विचरण कर रहे थे जब वह चंद्रमा के पास से गुजरे, तो अत्यंत रूपवान चंद्रमा ने गणपति के शरीर और रूप का उपहास किया तब गणेश जी ने कुपित हो कर उसे श्राप दे डाला कि तुम्हें अपने कर्मों का फल भुगतना होगा जिस रंग रूप पर तुम्हें इतना अहंकार है वह नष्ट हो जाएगा तो दर्शन करने वाले मनुष्यों को व्यर्थ का अपमान कलंक, निंदा एवं अनिष्ट  का भागी बनना पड़ेगा और वे मेरे श्राप से प्रभावित होंगे 

इस भयंकर श्राप को सुन कर चंद्रमा का मुंह अत्यंत म्लान हो गया वह मारे डर के जल में चुप कर कुमुद (श्वेत कमल ) में रहने लगा यह जान कर सभी देवता भी दुःखी हुए तब मिल कर चंद्रमा को उपाय सुझाया कि चतुर्थी के दिन, विशेष कर कृष्ण पक्ष में , सायं काल भोजन करना चाहिए फल , खीर , मिठाई (मोदक ) से उन्हें प्रसन्न करना चाहिए तथा ब्रह्रामन को विधि अनुसार दान करना चाहिए 

अतः चंद्रमा ने उपर्युक्त तरीके से गणेश जी की स्तुति की तथा अपने घमंड से किये उपहार पर पश्चाताप किया अतंतः गणेश जी प्रसन्न हो गये और चंद्रमा ने कहाः प्रभु ! ऐसा वरदान दें कि अपने पाप और श्राप से निवृत हो जाऊं तथा मनुष्य फिर मेरे दर्शन कर सुखमय हों गणेश जी ने पहले तो यह वरदान देने से इंकार कर दिया परंतु सभी देवगणों की प्रार्थना सुन कर गणेश बोलेः जाओ शशांक ( चंद्रमा ) मैंने तुम्हे अपने श्राप से मुक्त किया लेकिन ( भाद्रप्रद ) शुक्ल पक्ष  की चतुर्थी को जो तुम्हारे दर्शन करेगा उसे मिथ्या विवाद और कष्टों से गुजरना पड़ेगा किन्तु जो मनुष्य मेरे पहले ( अर्थात चतुर्थी से पहले ) तुम्हारा दर्शन करेंगे ( अर्थात शुक्ल पक्ष की द्वितीय के रोज तुम्हारा दर्शन कर लेंगे ) उनको यह दोष नही लगेगा फिर चंद्रमा ने गणेश जी से उन्हें प्रसन्न करने के उपाय जाने तथा पूजन विधि जानी बस तबसे हर वर्ष चंद्रमा, गणेश चतुर्थी का व्रत रख, गणेश जी की पूजा करते आ रहे है 

एक बार श्री कृष्ण ने , अनजाने में ही, भाद्रप्रद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का चांद देख लिया था, जिसकी वजह से उन्हें जीवनभर चोरी के कलंक का सामना करना पड़ा था 

अष्ट विनायक गणेश : यों तो भगवान गणेश जी के अनेक अवतार है परंतु उनमें से आठ अवतार अधिक प्रसिद्ध है इन अवतारों के नाम श्री गणेश द्वारा संहार किये गये है यदि इन असुरों का विवेचन कर देखें, तो मत्सय, मद , मोह , लोभ, क्रोध, काम , ममता तथा अहंतारूप जैसे अंतः शत्रुओं के नाम उभर कर आते है भगवान श्री गणेश का यह संहारक रूप इस सृष्टि के विघ्नहर्ता रूप का परिचायक है गणेश जी के बारह नमः 

सुमुखः सुंदर मुख वाले 

एकदंतः एक दांत वाले 

कपिलः जिनके श्री विग्रह से नीले और पीले वर्ण की आभा का प्रसार होता रहता है 

गजकर्णकः हाथी के कान वाले 

लंबोदरः लंबे उदर वाले 

विकट : सर्वश्रष्ठ 

विघ्ननाशः विध्नों का नाश करने वाले 

विनायकः विशिष्ट नायक उन्नत मार्ग पर ले जाने वाले 

धूम्रकेतुः धुंए के से वर्ण की ध्वजा वाले 

कोषाध्यक्ष : गणों के स्वामी 

भालचन्द्रः मस्तक पर चंद्र कला धारण करने वाले 

गजाननः हाथी के मुख वाले 

इन बारह नामों का पाठ, अथवा श्रवण करने से विद्यारंभ, विवाह , गृह- नगर में संग्राम तथा किसी भी संकट के समय कोई विघ्न नही होता है  

* उच्छिष्ट गणपति सिद्धि प्रयोग 

यह एक दिन की साधना है और यदि साधक पूर्ण विधि - विधान के साथ इस साधना को करता है तो विश्वमित्र संहिता के अनुसार इससे उसे पांच लाभ हाथोंहाथ प्राप्त होते है कई बार देखा गया है कि इधर साधना की भी प्राप्ति संभव होने लगती है पांच लाभ निम्न है 

* समस्त कर्जों की समाप्ति और दरिद्रता का निवारण 

* निरंतर आर्थिक - व्यापारिक उन्नति 

* लक्ष्मी प्राप्ति और उसका पूर्ण उपभोग 

* भगवान गणपति के प्रत्यक्ष दर्शनों की संभावना 

* प्रबल इच्छा और उसकी पूर्णता का मार्ग प्रशस्त होना 

 यह प्रयोग गणेश जयंती को किया जाता है यह जयंती भाद्र चतुर्थी को होता है शास्त्रों में कहा गया है कि यह प्रयोग किसी भी बुधवार को संपन्न किया जा सकता है परन्तु गणपति सिद्धि दिवस, यानि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी शीघ्र सफलतादायक है शास्त्रों के अनुसार यह प्रयोग दिन या रात्रि में , कभी भी संपन्न किया जा सकता है जीवन में जो इच्छाएं पूर्ण हों उन इच्छाएं, या अभावों की पूर्ति को ही उच्छिष्ट कहा गया है 

साधक निम्न सामग्री को पहले से ही तैयार कर लें जिसमें जल पात्र , केसर, कुंकुम, चावल, पुष्प, माला, नारियल , दूध, शक्कर (गुड़ ) से बना खीर, घी का दीपक, अगरबत्ती, मोदक आदि है इनके अलावा उच्छिष्ट गणपति यंत्र और मूंगे की माला की नितांत आवश्यकता होती है 

सर्वप्रथम साधक, स्नान कर, पीले वस्त्र पहन कर पूर्व की और मुख कर के बैठ जाए और सामने उच्छिष्ट गणपति सिद्धि यंत्र को एक थाली में कुंकुम से स्वस्तिक बना कर स्थापित कर ले और फिर हाथ जोड़ कर भगवान गणपति का ध्यान करें 

ध्यान मन्त्रः 

सिंदूर वर्ण संकाश योग पट संविन्त लम्बोदर महकायं मुखं करी करोपमं अणिमादि गुणयुक्ते अष्ट बहुत्रिलोचनं विग्मा विघते लिंगे मोक्ष कमाम पूजयेत 

ध्यान करने के बाद जो भी मनोकामना हो वह नाम गोत्र आदि का उच्चारण करते हुऐ गणेश जी के चरण में संकल्प वाक्य पढ़ते हुए रख दें संकल्पः ओमच्य भाद्र मासि शुक्ले पक्षे चतुर्थोयों तिथौ  वत्य  गोत्रस्य महेश मोहन शर्मन : धन प्राप्तिः कामः श्री उच्छिष्टगणपति प्रसाद कामशय ऊँ एक दंताय

   विदम्हे वक्र टुण्डाय धीमहि तन्नोविघ्न प्रचोदयात इति मंत्रस्य एक विंशति माला जपं अहं करिष्ये साधक  अपने अनुसार रेखा के ऊपर नाम , गोत्र मनोकामना आदि का उच्चारण करें इसके बाद भगवान उच्छिष्ट गणपति आठ भुजाओं वाले है ऐसा चिंतन मन में लाते हुए उनकी आठों भुजाओं को निम्न लिखित प्रकार से प्रणाम करें: ऊँ अं अणिमायै  नमः स्वाहा 

ऊँ मं महिमायै नमः स्वाहा 

ऊँ वे वशितायै नमः स्वाहा 

ऊँ गं गरिमायै नमः स्वाहा 

ऊँ प्रे प्राप्तये नमः स्वाहा 

ऊँ ई ईशितायै नमः स्वाहा 

ऊँ के कमावसत्रितायै  नमः स्वाहा 

ऊँ सिं सिद्धयै स्वाहा 

इस प्रकार आठों भुजाओं का पूजन कर फिर गणेश वाहन मूषक का निम्न मंत्र से पूजन करेः 

ऊँ मं मुशिकात्र गणाधिय वाहनाम धर्म शत्राम स्वाहा 

इसके बाद , केसर, जल , पुष्प,गुलाल, दीप आदि से, उच्छिष्ट गणपति यंत्र की पूजा करें यंत्र पूजा करने के बाद योग (नैवेघ ) लगा खीर वहीं बैठे बैठे कुछ अंश खा कर बिना आचमन किये मंत्र का जप 21 माला करें मुह झूठा हो , लेकिन हाथ धो लेना चाहिए खीर के बदले मोदक भी खा सकते है क्योंकि उच्छिष्ट गणपति को मोदक अत्यंत प्रिय है मै ही गणेश हूं ऐसा ध्यान कर के निम्न मंत्र का जाप करें ऊँ एक दंताय विदम्हे  वक्र तुंडाय  धीमहि तन्नो विघ्न प्रचोदयात 

इसके बाद पूजा स्थान पर रखे गए नारियल को तोड़ कर उसके अंदर की गिरी भगवान गणपति को समर्पित कर दें इससे प्रयोग सिद्ध हो जाता है और इससे संबंधित जो लाभ पीछे बताये गये है वे तुरंत फलप्रद होते है अंत में शुद्ध घृत से भगवान गणपति की आरती संपन्न करें और प्रसाद वितरित करें इस प्रकार से साधक की मनोवांछित कामनाएं निश्चय ही पूर्ण हो जाती है और कई बार तो यह प्रयोग संपन्न होते ही साधक को अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है    

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana

 

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