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श्राद्ध ( पितृ पक्ष) कब 2018

श्राद्ध ( पितृ पक्ष) कब 2018

 

 

हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज़, व्रत-त्यौहार व परंपराएं मौजूद हैं। हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिये अपने पूर्वज़ों को के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

हिन्दू धर्म में पितृ अर्थात मृत पूर्वजों का तर्पण करवाना बहुत प्राचीन प्रथा है। महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुंची। तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिया गया। परन्तु कर्ण की आत्मा को कुछ समझ नहीं आया और वह आहार तलाशते रहे। लेकिन उन्हें आहार नहीं मिला, बल्कि ओर सोना मिलता रहा। इस बात से कर्ण बहुत परेशान हो गए और उन्होंने इंद्र देवता से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया जा रहा है ? तब इंद्र देवता ने कर्ण को बताया कि तुमने अपने पूरे जीवन में जीवित रहते हुए सोना ही दान किया। लेकिन श्राद्ध के दौरान अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर पाऐ। इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा दिया।  जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध किया और उन्हें आहार दान करते हुए तर्पण किया।  इन्हीं 16 दिन की अवधि को पितृपक्ष या श्राद्ध कहा जाता है। जिसके लिए हमारे पंचांग में श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन निर्धारित किए गए हैं जिसमे व्यक्ति अपने पूर्वजों को याद करते है और उनका तर्पण करवा कर उन्हे शांति और तृप्ति प्रदान करते है। ताकि आपको उनका आर्शीवाद और सहयोग मिलता रहे।

पितृ पक्ष का महत्व

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। इसके पिछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशास्त्र में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है। जब जातक सफलता के बिल्कुल नज़दीक पंहुचकर भी सफलता से वंचित होता हो, संतान उत्पत्ति में परेशानियां आ रही हों, धन हानि हो रही हों तो ज्योतिषाचार्य पितृदोष से पीड़ित होने की प्रबल संभावनाएं बताते हैं। इसलिये पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है।

शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करने से मनुष्य को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही घर में सुख-शांति और समृद्धि में बरकत होती है।

श्राद्ध पक्ष में वर्जित व करने लायक कार्य

श्राद्ध के समय मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।

पितृपक्ष में पशु-पक्षि को पानी और दाना डालना शुभ माना जाता है।

श्राद्ध में ब्राह्माणों को भोजन करवाना बहुत शुभ होता है।

श्राद्ध के समय पितृओं के लिए रोज पहली रोटी निकालना अनिर्वाय होता है।

देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना बहुत ही कल्याणकारी होता है।

वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिये पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वज़ों का श्राद्ध करें इसके लिये शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज़, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है इसे सर्वपितृ अमावस्या भी इसलिये कहा जाता है। समय से पहले यानि जिन परिजनों की किसी दुर्घटना अथवा सुसाइड आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिये अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिये उपयुक्त मानी जाती है।

 

  कब से कब तक है पितृ पक्ष (श्राद्ध)?

1. श्राद्ध , 2. श्राद्ध , 3. श्राद्ध, 4. श्राद्ध, 5.श्राद्ध, 6. श्राद्ध, 7. श्राद्ध ,8.श्राद्ध, 9. श्राद्ध, 10. श्राद्ध, 11. श्राद्ध, 12. श्राद्ध, 13. श्राद्ध, 14. श्राद्ध, 15.श्राद्ध, 16.और अंतिम श्राद्ध की तारीख और वार

 

24 सितंबर 2018 सोमवार पूर्णिमा श्राद्ध

 25 सितंबर 2018 मंगलवार प्रतिपदा श्राद्ध

 26 सितंबर 2018 बुधवार द्वितीय श्राद्ध

 27 सितंबर 2018 गुरुवार तृतीय श्राद्ध

 28 सितंबर 2018 शुक्रवार चतुर्थी श्राद्ध

 29 सितंबर 2018 शनिवार पंचमी श्राद्ध

 30 सितंबर 2018 रविवार षष्ठी श्राद्ध

 1 अक्टूबर 2018 सोमवार सप्तमी श्राद्ध

 2 अक्टूबर 2018 मंगलवार अष्टमी श्राद्ध

 3 अक्टूबर 2018 बुधवार नवमी श्राद्ध

 4 अक्टूबर 2018 गुरुवार दशमी श्राद्ध

 5 अक्टूबर 2018 शुक्रवार एकादशी श्राद्ध

 6 अक्टूबर 2018 शनिवार द्वादशी श्राद्ध

 7 अक्टूबर 2018 रविवार त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध

 8 अक्टूबर 2018 सोमवार सर्वपितृ अमावस्या, महालय अमावस्या

पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपित्रू अमावस्या या महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है। पितृ पक्ष में महालय अमावस्या सबसे मुख्य दिन होता है। इस दिन किसी भी मनुष्य का श्राद्ध किया जा सकता है। जिन लोगों को अपने मृत पूर्वजों की तिथि का पूर्ण ज्ञान नहीं होता वे भी इस दिन पितरों का तर्पण करवा सकते है।

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पहला श्राद्ध

(24 सितंबर 2018, सोमवार)

तिथि – पूर्णिमा

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक

रौहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:24 तक

अपराह्न काल = 13:24 से 15:48 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो।

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दूसरा श्राद्ध

(25 सितंबर 2018, मंगलवार)

तिथि – प्रतिपदा

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:24 तक

अपराह्न काल = 13:24 से 15:47 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई हो। नानी-नाना का श्राद्ध भी इस दिन किया जा सकता है।

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तीसरा श्राद्ध

(26 सितंबर 2018, बुधवार)

तिथि – द्वितीय

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:23 तक

अपराह्न काल = 13:23 से 15:46 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु द्वितीय तिथि को हुई हो।

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चौथा श्राद्ध

(27 सितंबर 2018, गुरुवार)

तिथि – तृतीय

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:35 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:35 से 13:23 तक

अपराह्न काल = 13:23 से 15:45 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु तृतीय तिथि को हुई हो।

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पांचवा श्राद्ध

(28 सितंबर 2018, शुक्रवार)

तिथि – चतुर्थी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:35 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:35 से 13:22 तक

अपराह्न काल = 13:22 से 15:44 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।

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छठा श्राद्ध

(29 सितंबर 2018, शनिवार)

तिथि – पंचमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:22 तक

अपराह्न काल = 13:22 से 15:43 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो। यह श्राद्ध उन परिवारजनों के लिए भी किया जाता है जिनकी मृत्यु कुवारेंपन में हुई हो। इसलिए इसे कुंवारा पंचमी श्राद्ध भी कहा जाता है।

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सातवां श्राद्ध

(30 सितंबर 2018, रविवार)

तिथि – षष्ठी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:21 तक

अपराह्न काल = 13:21 से 15:43 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि को हुई हो।

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आठवां श्राद्ध

(1 अक्टूबर 2018, सोमवार)

तिथि – सप्तमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:21 तक

अपराह्न काल = 13:21 से 15:42 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु सप्तमी तिथि को हुई हो।

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नौवां श्राद्ध

(2 अक्टूबर 2018, मंगलवार)

तिथि – अष्टमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:33 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:33 से 13:20 तक

अपराह्न काल = 13:20 से 15:41 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु अष्टमी तिथि को हुई हो।

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दसवां श्राद्ध

(3 अक्टूबर 2018, बुधवार)

तिथि – नवमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:33 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:33 से 13:20 तक

अपराह्न काल = 13:20 से 15:40 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु नवमी तिथि को हुई हो। इस दिन को मुख्य रूप से माताओं और परिवार की सभी स्त्रियों के श्राद्ध के लिए भी उचित माना जाता है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहा जाता है।

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ग्यारहवां श्राद्ध

(4 अक्टूबर 2018, गुरुवार)

तिथि – दशमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:32 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:19 तक

अपराह्न काल = 13:19 से 15:39 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई हो।

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बारहवां श्राद्ध

(5 अक्टूबर 2018, शुक्रवार)

तिथि – एकादशी (ग्यारस श्राद्ध)

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:32 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:19 तक

अपराह्न काल = 13:19 से 15:39 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु एकादशी तिथि को हुई हो।

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तेरहवां श्राद्ध

(6 अक्टूबर 2018, शनिवार)

तिथि – द्वादशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:32 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:18 तक

अपराह्न काल = 13:18 से 15:38 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि को हुई हो। इस दिन उन लोगों का श्राद्ध भी किया जाता है जिन्होंने मृत्यु से पूर्व सन्यास ले लिया हो।

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चौदहवां श्राद्ध

(7 अक्टूबर 2018, शनिवार)

तिथि – त्रयोदशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:18 तक

अपराह्न काल = 13:18 से 15:37 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु त्रयोदशी तिथि को हुई हो। घर के मृत बच्चों का श्राद्ध करने के लिए भी इस दिन को शुभ माना जाता है।

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पंद्रहवां श्राद्ध

(7 अक्टूबर 2018, रविवार)

तिथि – चतुर्दशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:18 तक

अपराह्न काल = 13:18 से 15:37 तक

किसके लिए : चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध केवल उनकी मृतजनों के लिए करना चाहिए जिनकी मृत्यु किसी हथियार से हुई हो, उनका क़त्ल हुआ हो, जिन्होंने आत्महत्या की हो या उनकी मृत्यु किसी हादसे में हुई हो। इसके अलावा अगर किसी की मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई है तो उनका श्राद्ध अमावस्या श्राद्ध तिथि को ही किया जाएगा।

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सोलहवां और अंतिम श्राद्ध

(8 अक्टूबर 2018, सोमवार)

तिथि – अमावस्या

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक

रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:17 तक

अपराह्न काल = 13:17 से 15:36 तक

किसके लिए : जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि, पूर्णिमा तिथि और चतुर्दशी तिथि को हुई हो। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को अपने मृत परिवारजनों की तिथि याद नहीं रहती उनका श्राद्ध भी इसी दिन किया जा सकता है। क्योंकि इसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहते है।

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Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana