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गणेश चतुर्थी 13 से 23 सितंबर 2018

गणेश चतुर्थी 13 से 23 सितंबर 2018

 

 

 

Start Date 13 September 2018

End Date 23 September 2018

इस साल गणेश उत्सव  13 से 23 सितंबर तक मनाया जाएगा. खबरें हैं कि इस साल चतुर्थी वाले दिन अच्छे संयोग हैं. तो चतुर्थी वाले दिन सुबह सवेर नहाधोकर शुद्धि करने के बाद व्रत करने के बाद दोपहर में ही गणेश बप्पा की प्रतिमा को सिंदूर चढ़ाने के बाद घर में स्थापित करें

- माना जाता है कि देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्यकाल में हुआ था. 

- इस दिन को ही हर साल गणेश चतुर्थी मनाई जाती है. 

- तो इस बात का खास ध्यान रखें कि मध्यकाल में जन्म लेने के कारण इनकी स्थापना इसी काल में होनी चाहिए.

 

 त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. सितंबर महीने से गणेश जी का स्वागत करने के लिए पूरा देश तैयार है. अगर आपके मन में भी यह सवाल है कि गणेश चतुर्थी  कब है तो आपको बताते चलें कि गणेश चतुर्थी 13 सिंतबर से मनाया जाएगा. इस साल  गणेश उत्सव 13 से 23 सितंबर  तक चलेगा. गणेश चतुर्थी पर लोग घरों में गणपति बप्पा को स्थापित करते हैं. इस दौरान देश भर में गणेश भक्त जगह-जगह पर गणपति बप्पा के पंडाल  सजाते हैं. जो लोग घर पर गणपति को स्थापित करते हैं वे सुबह के भोग से लेकर शाम तक उनके आहार और शुद्धि से रहने का पूरा ख्याल रखते हैं. अगर आप भी घर में गणपति को स्थापित करने जा रहे हैं तो जरूरी है कि इससे जुड़े पूजा के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी लें. 

 

चतुर्थी तिथि शुरुआत -12 सितंबर 2018 को 16: 07 बजे

चतुर्थी तिथि खत्म- 13 सितंबर 2018 को 14 :51 बजे

12 सितंबर को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय - 16:07 से 20:33

 13 सितंबर को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय - 9:31 से 21:12

13 सितंबर मध्याह्न गणेश पूजा का समय - 11:03 से 13:30

कार्तिकेय के साथ प्रतियोगिता के दौरान माता पार्वती और पिता शिव के समक्ष भगवान गणेश ने वेद में लिखित यह वचन कहे, जो आज भी अति महत्वपूर्ण हैं-.

 

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रर्कान्तिं च करोति य:। तस्य वै पृथ्विीजन्यफलं भवति निश्चितम॥ 

अर्थात जो माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसको पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिलता है। देखा जाए तो भगवान गणेश ने माता-पिता को सर्वोच्च सम्मान देकर सभी को बता दिया कि जीवित देवी-देवता तो हमारे माता-पिता ही हैं।

 

गणेश चतुर्थी: ज्यादा सिद्ध माने जाते है इस दिशा में सूंड वाले गणपति

 

उनकी पूजा असल में सभी देवी-देवताओं की पूजा है। 13 सितंबर को विनायक चतुर्थी है। इसी दिन मध्याह्न में अवतरण हुआ था सभी देवी-देवताओं में प्रथमपूज्य विनायक का। इसे कलंक चतुर्थी और शिवा चतुर्थी भी कहा जाता है। देखा जाए तो अधिकांश मनुष्य किसी भी प्रकार का विघ्न आने से भयभीत हो उठते हैं। गणेश जी की पूजा होने से विघ्न समाप्त हो जाता है। 12 सितंबर को अपराह्न में चतुर्थी तिथि लगेगी, जो 13 सितंबर को अपराह्न तक रहेगी। इसलिए गणेश भक्तों को 12 व 13 सितंबर को चतुर्थी तिथि तक चंद्रमा के दर्शन से बचना होगा। नहीं बचे तो झूठा कलंक लग जाएगा, उसी तरह जैसे श्रीकृष्ण पर लगा था स्यमंतक मणि चुराने का। पर चंद्र को देख ही लिया तो इसी कृष्ण-स्यमंतक कथा को पढ़ने या विद्वतजनों से सुनने पर भगवान गणेश क्षमा कर देते हैं। इसके साथ ही हर दूज का चांद देखना भी जरूरी है, कलंक से बचने के लिए। 

 

गणेश चतुर्थी 2018: किसी भी शुभ काम से पहले क्यों होती है गणेश पूजा, जानें पूरी कथा

तरह-तरह की मनोकामना पूरी करने के लिए विनायक कई उपाय बताते हैं। अगर आपको अपने दुश्मनों को रोकना है तो फिर गणेश भगवान के पीली कांति वाले स्वरूप का ध्यान करना होगा। किसी को अपने वश में करना है तो उनके अरुण कांतिमय स्वरूप का मन ही मन ध्यान करें। किसी के मन में अपने लिए प्रेम पैदा करना है तो लाल रंग वाले गणेश जी का ध्यान करें। बलवान आदि होने के लिए भी इसी रूप का ध्यान करें। जिनको धन पाने की इच्छा हो, उन्हें हरे रंग के गणेशपूजा करनी चाहिए और जिन्हें मोक्ष प्राप्त करना है, उन्हें सफेद रंग के गणपति की पूजा करनी चाहिए। लेकिन इन कार्यों में पूरी सफलता तभी मिलेगी, जब आप तीनों समय गणपति का ध्यान और जाप करेंगे। .

 

इस दिन मध्याह्न में गणपति पूजा में 21 मोदक अर्पण करके- ‘विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक। कार्यं मे सिद्धिमायातु पूजिते त्वयि धातरि', मंत्र से प्रार्थना करें। गणेश को अर्पित किया गया नैवेद्य सबसे पहले उनके सेवकों- गालव, गार्ग्य, मंगल और सुधाकर को देना चाहिए। चंद्रमा, देवाधिदेव गणेश और चतुर्थी माता को दिन में अर्घ्य अर्पित करें। संभव हो तो रात्रि में विनायक कथा सुनें या भजन करें।

 भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी भगवान की पूजा बिना प्रसाद चढ़ाएं कभी पूरी नहीं होती। हर देवी-देवता को अलग-अलग प्रसाद पसंद होता है। जैसे गणपति जी को मोदक अति प्रिय है। लेकिन  क्यों?

शास्त्रों में वर्णन हैं मोदक का अर्थ होता हैं मोद (आनन्द) देने वाला, जिससे आनंद मिलता है। इसका गहरा अर्थ यह है कि तन का आहार हो या मन के विचार वह सात्विक और शुद्ध होना जरुरी है, तभी आप जीवन का वास्तविक आनंद पा सकते हैं। मोदक ज्ञान का प्रतीक होता हैं, इसलिए यह ज्ञान के देवता भगवान गणेश को अतिप्रिय हैं। मोदक जिस प्रकार बाहर से कड़ा व भीतर से नरम और मिठास से भरा होता है। उसी प्रकार घर का मुखिया ऊपर से सख्ती से नियमों का पालन करवाएं एवं भीतर से नरम रहकर सभी का पालन पोषण करे तो उस घर में सुख व्याप्त होता है। 

वैसे ही जो जातक हजार मोदको से गणेशजी को भोग लगाता है वह जातक अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है।

 उनके जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार यह 13 सितंबर को है। गणपति की आराधना जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी है। गणपति की प्रतिमा को लेकर एक जिज्ञासा हमेशा रहती है कि उनकी सूंड किस दिशा में होना चाहिए। कई बार भगवान गणेश की मूर्ति की कहीं दाईं ओर तो कहीं बाईं ओर सूंड दिखाई देती हैं। लेकिन बाईं ओर सूंड वाले गणपति ज्यादा सिद्ध माने जाते हैं। 

जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है। माना जाता है कि बाईं ओर की सूंड किए गणपति हमेशा ही सकारात्मक नतीजे देते हैं। वैसे भी गणपति को बुद्धि का देवता कहा जाता है। यदि विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो बुद्धि दो भागों में बटीं होती है। इन्हें विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं लगती। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं। थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं। त्रुटियों पर क्षमा करते हैं।

 गणपति को अपने घर में प्रतिष्ठापित करने से सारे कष्ट मिट जाते हैं।  गणपति महाराज विघ्नों को दूर करने वाले और मंगल करने वाले देव हैं। किसी भी देव की पूजा हो, घर में मंगल कार्य हों, बिना गणपति की पूजा के कोई विधान पूरा नहीं होता। यह अधिकार भगवान शंकर ने उनको प्रदान किया है। इसलिए, वह देवों के देव हैं। देवों में अग्रणी देव। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति को घर में विराजमान करने का विधान है। आइये, हम आपको बताते हैं कि किस प्रकार गणपति को अपने घर में विराजमान करें।

कैसे उनका आह्वान करें। गणपति का आह्वान ठीक उसी प्रकार होता है, जैसे आप गृह प्रवेश करते हैं।

संकल्प: पहले दाएं हाथ में अक्षत और गंगाजल लेकर संकल्प करें कि हम गणपति को अपने घर तीन, पांच, सात और दस दिन के लिए विराजमान करेंगे। ऊं गणेशाय नम: मंत्र के साथ संकल्प लें। यह संकल्प हुआ कि आप भगवान गणपति को अपने घर में विराजमान करेंगे। प्रतिदिन उनकी पूजा करेंगे।

 

आह्वान: संकल्प के बाद आप गणपति जी को लेकर आइये। लेकिन इससे पहले घर का सजाए-संवारे। घर स्वच्छ हो। जिस स्थान पर विराजमान करना हो, वह पवित्र होना चाहिए। आह्वान करें कि हे गणपति, हम आपको अपने घर में ......( दिन का उल्लेख करें)  के लिए अपने समस्त परिवार.....( परिवार के सदस्यों के नाम लें).....अमुक गोत्र...( गोत्र का नाम लें) घर में सुख शांति समृद्धि के लिए प्रतिष्ठापित कर रहे हैं। हे गणपति, आप हमारी मनोकामनाएं पूरी करें और ऋद्धि-सिद्धि के साथ विराजमान हों। ज्ञात-अज्ञात यदि हमसे कोई भूल हो जाए तो आप क्षमा करना। आह्वान मंत्र कोई भी हो सकता है। यदि संस्कृत श्लोक न कर सकें तो ऊं गणेशाय नम: का ही जाप करते रहें।

पूजा स्थल

नियत दिन पर आप गणपति को अपने घर में विराजमान करें। कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। चार हल्दी की बिंदी लगाएं। एक मुट्ठी अक्षत रखें। इस पर छोटा बाजोट, चौकी या पटरा रखें। लाल, केसरिया या पीले वस्त्र को उस पर बिछाएं। रंगोली, फूल, आम के पत्ते और अन्य सामग्री से स्थान को सजाएं। एक तांबे का कलश पानी भर कर, आम के पत्ते और नारियल के साथ सजाएं। यह समस्त तैयारी गणेश उत्सव के आरंभ होने के पहले कर लें।

गणपति की प्रतिष्ठापना

जब गजानन को लेने जाएं तो स्वच्छ और नवीन वस्त्र धारण करें।  यथासंभव, चांदी की थाली में स्वास्तिक बनाकर और फूल-मालाओं से सजाकर उसमें गणपति को विराजमान करके लाएं। यदि चांदी की थाली संभव न हो पीतल या तांबे की भी चलेगी। मूर्ति बड़ी है तो आप हाथों में लाकर भी विराजमान कर सकते हैं। जब घर में विराजमान करें तो मंगलगान करें, कीर्तन करें। गणपति को लड्डू का भोग लगाएं। लाल पुष्प चढ़ाएं। प्रतिदिन प्रसाद के साथ पंच मेवा जरूर रखें।

पांच इलायची और पांच कमलगट्टे

भगवान गणपति के आगे एक छोटी कटोरी में पांच छोटी इलायची और पांच कमलगट्टे रख दें। गणेश चतुर्थी तक इनको गणपति के आगे ही रहने दें। चतुर्थी के बाद कमलगट्टे एक लाल कपड़े में करके पूजा स्थल पर रहने दें और छोटी इलायची को गणपति का प्रसाद मानते हुए ग्रहण कर लें। यह समस्त कार्यों की सिद्धि का उपाय है। सारे कष्ट इससे समाप्त होते हैं। चंद्रमा, राहू, केतू की छाया भी नहीं पड़ेगी।

 

पूजन विधि :

आचमन- ॐ केशवाय नम:। ॐ नारायणाय नम:। ॐ माधवाय नम:।

 

कहकर हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें एवं ॐ ऋषिकेशाय नम: कहकर हाथ धो लें।

इसके बाद  शरीर शुद्धि करें..

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:।।

 

गणपति स्थापना में इन बातों का रखें ध्यान

- जल से भरा हुआ कलश गणेश जी के बाएं रखें।

 -चावल या गेहूं के ऊपर स्थापित करें।

- कलश पर मौली बांधें एवं आमपत्र के साथ एक नारियल उसके मुख पर रखें।

-गणेश जी के स्थान के सीधे हाथ की तरफ घी का दीपक एवं दक्षिणावर्ती शंख रखें।

-गणेश जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था, इसलिए मध्याह्न में ही प्रतिष्ठापित करें।

-10 दिन तक नियमित समय पर आरती करें।

- पूजा का समय नियमित  रखें। जाप माला की संख्या भी नियमित  ही रखें।

-गणेश जी के सम्मुख बैठकर उनसे संवाद करें। मंत्रों का जाप करें। अपने कष्ट कहें।

-शिव परिवार की आराधना अवश्य करें यानी भगवान शंकर और पार्वती जी का ध्यान अवश्य करें।

 

सुपारी गणेश और मिट्टी के गणेश भी रख सकते हैं

यदि आपकी सामर्थ्य न हो तो आप घर में सुपारी गणेश और पीली मिट्टी से गणेशाकृति बनाकर उनको स्थापित कर सकते हैं। इसमे कोई दोष नहीं है। सुपारी गणेश और पीली मिट्टी के गणेश जी बनाकर स्थापित करने से वास्तु दोष भी समाप्त होते हैं। लेकिन इतना ध्यान रखें कि पूजा नियमित हो। पीली मिट्टी के गणेश जी का स्नान नहीं हो सकता, इसलिए गंगाजल के छींटे लगा सकते हैं।

पूजन विधि और सामग्री :

 

पंचोपचार पूजन- 1. गंध, 2. पुष्प, 3. धूप, 4. दीप, 5 नैवेद्य।

 

षोडषोपचार पूजन-

1. आह्वान,

2 आसन

3 पाद्य (हाथ में जल लेकर मंत्र पढ़ते हुए प्रभु के चरणों में अर्पित करें),

4. अर्घ्य

5 आचमन

6. स्नान (पान के पत्ते या दूर्वा से स्नान कराएं)

7. वस्त्र

8. जनेऊ

9. हार, मालाएं

10. गंध (इत्र छिड़कें या चंदन अर्पित करें),

11. पुष्प,

12. धूप,

13. दीप,

14. नैवेद्य (पान के पत्ते पर फल, मिठाई, मेवे आदि रखें।),

15. ताम्बूल (पान चढ़ाएं),

16. प्रदक्षिणा व पुष्पांजलि।

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana