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सिंह संक्रांति 2018

सिंह संक्रांति 2018

 

 

वर्ष 2018 में सिंह संक्रांति 17 अगस्त 2018, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। 17अगस्त 2018 को सूर्य सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है 

हर महीने जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तक संक्रांति आती है और वर्ष में कुल 12 संक्रांति आती है। सिंह संक्रांति भी इन्ही में से एक है। जब सूर्य कर्क राशि से सिंह राशि में प्रवेश करता है। भाद्रपद (भादो) महीने की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं, दक्षिणी भारत में सिंह संक्रांति को सिंह संक्रमण भी कहा जाता है। उत्तराखंड में घी संक्रांति या ओल्गी संक्रांति के रूप में मनाई जाती है| वस्तुतः यह कृषि और पशुपालन से जुड़ा हुआ एक लोक पर्व है| बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियाँ आने लगती हैं| किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं| बालियों को घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाया जाता है| बरसात में पशुओं को खूब हरी घास मिलती है| दूध में बढ़ोतरी होने से दही-मक्खन-घी भी प्रचुर मात्रा में मिलता है| अतः इस दिन घी का प्रयोग अवश्य ही किया जाता है| इस दिन को सभी बड़े पर्व के रूप में मनाते है। उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यहां हर परिवार जरूर घी का सेवन करता है। जिसके घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं। 

सिंह संक्रांति के दिन भगवान् विष्णु, सूर्य देव और भगवान नरसिंह का पूजन किया जाता है। इस दिन भक्त पवित्र स्नान करते है। जिसके बाद देवताओं का नारियल पानी और दूध से अभिषेक किया जाता है। जिसके लिए केवल ताजे नारियल पानी का ही इस्तेमाल किया जाता है।

बहुत से लोग इस दिन भगवान गणेश का भी पूजन करते है और प्रार्थना करते है। कुछ समुदायों में सूर्य राशि के कन्या राशि में प्रवेश करने तक विशेष पूजन किया जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा का खास महत्व होता है। क्योंकि सूर्य देव को सिंह राशि का देवता माना जाता है। वर्ष 2018 में सिंह संक्रांति का शुभ मुहूर्त और पुण्यकाल का मुहूर्त नीचे दिया गया है।

कैसे मनाई जाती है?

सिंह संक्रांति के दिन कई तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनमें दाल की भरवां रोटियां, खीर और गुंडला या गाबा (पिंडालू या पिनालू के पत्तों से बना) प्रमुख हैं। यह भी कहा जाता है कि इस दिन दाल की भरवां रोटियों के साथ घी का सेवन किया जाता है| इस रोटी को बेडु की रोटी कहा जाता है| इसमें जिस भरवा को भरा जाता है उसे उरद दाल को पीस कर पीठा बनाया जाता है और उसे पकाकर घी से साथ खाया जाता है| रोटी के साथ खाने के लिए अरबी नाम की सब्ज़ी के खिले पत्तों की सब्ज़ी बनायीं जाती है| इन पत्तों को ही गाबा कहा जाता है| इसके साथ ही समाज के अन्य वर्ग जैसे वास्तुकार, शिल्पकार, दस्तकार, लौहार, बढ़ाई अपने हाथ से बनी चीज़े भेंट स्वरुप लोगों को देते है और ईनाम प्राप्त करते है| अर्थात जो लोग कृषि व्यवसाय से नहीं भी जुड़े है वें लोग भी इस त्यौहार का हिस्सा होते है| भेंट देने की इस परंपरा को ओल्गी कहा जाता है इसलिए इस संक्रांति को ओल्गी संक्रांति भी कहते है|  

कहा जाता है जो इस दिन घी नहीं खायेगा उसे अगले जन्म में गनेल यानी घोंघे के रूप में जन्म लेना होगा| यह घी के प्रयोग से शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि का संकेत देता है| शायद यही वजह है कि नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है। यहां तक उसकी जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है। 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana