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किस ग्रह से होती है कौन सी बीमारी

किस ग्रह से होती है कौन सी बीमारी

 

 

कौन सा ग्रह शरीर के किस अंग का प्रतिनिधि है

सौरमंडल के सभी नौ ग्रहों का हमारे जीवन पर प्रभाव देखा जा सकता है। जन्म के समय मौजूद ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों के आधार पर हमारी कुंडली का निर्माण होता है और फिर यही ग्रह अपने-अपने स्वभाव अनुरूप हमारे जीवन को चलाते हैं।

कई बार आप सोचते होंगे कि लाख दवा कराने, डॉक्टरों के यहां बार-बार जाने, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च में मत्था टेंकने के बाद भी स्वास्थ्य ठीक नहीं हो रहा है तो एक बार किसी जानकार ज्योतिषविद से परामर्श ले लें। कारण यह कि कई बार ग्रहों द्वारा उपजाए विकार को चिकित्सक ठीक नहीं कर पाते हैं। यदि षष्ठेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश तथा रोग कारक ग्रह अशुभ तारा नक्षत्रों में स्थित होते हैं तो रोग की चिकित्सा निष्फल होने लगती है। शास्त्रों के अनुसार यदि षष्ठेश चर राशि में तथा चर नवांश में स्थित होते हैं तो रोग की अवधि छोटी होती है।

किसी भी परेशानी का हल तब ही ठीक से निकल पाता है जब दिक्कत का ठीक से पता हो। हर ग्रह अलग-अलग अंगों का कारक है और अगर हमारी राशि में किसी ग्रह में भी कोई दोष है तो हमें बीमारी का सामना करना ही पड़ेगा। 

सूर्य हड्डियों का कारक है अगर किसी व्यक्ति विशेष को हड्डियों का कोई रोग है तो उसे सूर्य ग्रह के उपाय से लाभ प्राप्त होगा। इस हेतु गेहूं सोना, ताम्बा, गुड़ आदि के दान से लाभ मिलता है। 

सूर्य ग्रह

शुरुआत करते हैं शरीर के सबसे ऊपरी भाग मस्तिष्क से। भारत के पौराणिक ऋषियों ने भी मस्तक के बीचो बीच भगवान सूर्य का स्थान माना है। ज्योतिष विद्या के अनुसार भी मस्तिष्क पर सूर्य देव का अधिकार होता है। चिंतन और मनन, इन सभी का आधार सूर्य ग्रह को माना गया है।

सूर्य : मुंह में बार-बार थूक इकट्ठा होना, झाग निकलना, धड़कन का अनियंत्रित होना, शारीरिक कमजोरी और रक्त चाप।

सूर्य नेत्र भाव में सूर्य, चंद्र या शुक्र अकेले या युत हो तो नेत्र विकार उत्पन्न करता है। शुक्र की युति चंद्र या सूर्य के साथ हो तो स्थायी नेत्र विकार उत्पन्न करता है। सूर्य और शनि की युति समलबाई, सूर्य और राहु की युति आंखों में अल्सर उत्पन्न करती है। शुक्र और चंद्रमा की युति से मोतियाबिंद होता है। सूर्य या चंद्र के साथ नीच या वक्री मंगल नेत्र भाव में स्थित होने पर नेत्र की हानि करता है। दाहिने और बायें नेत्र में रोगकारक शुक्र की स्थिति यदि चंद्रमा से दृष्ट है तो मायोपिया नामक रोग होता है।

उपचार: हृदय रोग से रक्षा हेतु सूर्य और चंद्र को अघ्र्य दें एवं आदित्य स्तोत्र का पाठ 40 दिन तक करें। नेत्र रोग से बचाव हेतु सूर्य और चंद्र को अर्घ्य दें एवं 40 दिनों तक चाक्षुषी विद्या का पाठ करें। सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तांबे का लोटा, रोली, लाल फूल एवं दूर्वा का उपयोग करें। सूर्य से संबंधित सभी रोगों के निवारण हेतु तुलादान – शरीर के भार के बराबर गेहूं तौलकर रविवार को दिन के 12 बजे ब्राह्मण को दान करें। चंद्रमा से शीत प्रकोप, स्नोफीलिया आदि हो सकते हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए चांदी का बर्तन, सफेद फूल एवं चावल का प्रयोग हितकर होता है।

 

चंद्रमा

इसी तरह चंद्रमा से विशेष फल की प्राप्ति होगी। सर्दी, जुकाम का भी कारक चन्द्र ही है। चन्द्र ग्रह के उपाय हेतु चावल, जल, दूध, चांदी, चीनी का दान अत्यंत उत्तम बताया गया है। 

सूर्य ग्रह से एक अंगुली नीचे चंद्रमा का स्थान माना गया है। चंद्रमा का नाता भावुकता और चंचलता से है, साथ ही मनुष्य की कल्पना शक्ति भी चंद्रमा के द्वारा ही संचालित होती है।

विज्ञान के साथ-साथ ज्योतिष भी यही कहता है कि चंद्रमा को अपनी रोशनी के लिए सूर्य पर ही निर्भर रहना पड़ता है, इसलिए चंद्रमा हमेशा सूर्य के साये में ही रहता है। जब सूर्य का तेज रोशनी बनकर चंद्रमा पर पड़ता है तभी व्यक्ति के विचार, उसकी कल्पना और चिंतन में सुधार आता है।

चंद्रमा : दिल और आंख की कमजोरी।

चंद्र और बुध की युति षष्ठ या द्वितीय भाव में होने पर नजला या नासूर तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में विकार उत्पन्न हो जाता है। यदि चंद्र छठे, सातवें और आठवें भाव में षष्ठेश से दृष्ट हो तो प्रमेह, मधुमेह, अतिमूत्र आदि रोग उत्पन्न होते हैं। बहुमूत्र में एक लीटर जल पांच मिनट तक अनवरत धारा में प्यूबिक ग्लैंड और जननांग के मध्य स्थान में गिराएं। इससे शुक्र पर नियंत्रण तथा अनेक प्रकार के जननांगीय रोग जैसे ल्यूकोरिया, यूरीनरी ट्रैक इनफेक्शन (यूटीआई) दूर होंगे। (यह प्रयोग स्नान के पूर्व करें।)

मंगल ग्रह

बुखार, दुर्घटना का कारक मंगल ग्रह है। गुड़ का दान मंगल के लिए उत्तम है।

माना जाता है कि अगर कोई जातक गायों को गुड़ खिलाता है तो उसका सूर्य और मंगल दोनों ही प्रभावी रहेंगे।

गरुड़ पुराण के अनुसार नेत्रों में मंगल ग्रह का निवास माना गया है। मंगल ग्रह शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और यह रक्त का संचालक माना गया है।

हमारा शरीर कितना मजबूत और कितना कमजोर है इसका अंदाजा नेत्रों से ही लगता है। इसलिए नेत्रों को ही मंगल ग्रह का स्थान माना गया है।

मंगल : रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, जिगर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े होना।

उच्च का मंगल छठे, आठवें और बारहवें भावों में उच्च रक्तचाप उत्पन्न करता है। नीच अवस्था या अस्त एवं शत्रुक्षेत्री मंगल निम्न रक्तचाप उत्पन्न करता है। साथ ही मंगल राहु की युति छठे भाव में होने पर लाल कुष्ठ रोग तथा चंद्र राहु की युति छठे भाव में होने पर श्वेत कुष्ठ रोग हो जाता है। यदि चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो दहेड़ी रोग होता है।

उपाय: भोजन का प्रथम ग्रास कुत्ते को खिलाएं। चंद्र, राहु की युति मंगल से होने पर श्वान को दूध पिलाएं। कुष्ठ रोग होने पर खैर की लकड़ी से 40 दिन तक समिधा हवन करें। लटजीरा एवं तुलसी की पत्तियां बराबर मात्रा में गंगाजल में पीस कर पलाश के पत्ते पर रखें और पीड़ित स्थान पर लेप करें। यदि हीमोग्लोबिन में उतार चढ़ाव हो रहा हो या एनीमिया की स्थिति बन रही हो तो मंगलवार को प्रातः लाल कपड़ा ओढ़कर बहते जल (नदी) में मसूर की दाल प्रवाहित करें।

बुध ग्रह 

हरे रंग को संबोधित करता है। गायों को हरा चारा डालना, हरी मूंग का दान बुध के विशेष उपाय हैं। खांसी, गले के रोगों का कारक ही बुध है अगर बुध के उपाय किए जाएं तो जातक को इन बीमारियों से जल्दी ही छुटकारा मिलता चला जाएगा।

बुध ग्रह को हृदय में स्थापित ग्रह माना गया है। बुध बौद्धिकता और वाणी का कारक ग्रह माना गया है। जब भी किसी व्यक्ति का व्यवहार, स्वभाव और वाचन शक्ति का पता लगाना हो तो अरबी ज्योतिष विद्या, रमल के अंतर्गत बुध ग्रह की स्थिति को ही देखा जाता है।

बुध : चेचक, नाड़ियों की कमजोरी, जीभ और दाँत का रोग।

बुध माइग्रेन एवं आंतों का रोग देता है। जब बुध द्वादश भाव या लग्न में सूर्य से युति करे तो तीव्र माइग्रेन होता है। इस परेशानी से निजात पाने के लिए कांसे के पात्र में घी भर कर उसके ऊपर साबुत मूंग की दाल ढंककर बुधवार को सिर के चारों ओर छह बार घुमाएं और किसी ब्राह्मण को दान दे दें। माइग्रेन एवं आंतों के रोग में प्रत्येक बुधवार को जल में गंगाजल मिला लें और उसमें कुशा डालकर ‘ओम बुधाय नमः’ का 108 बार जप करें। जप करते समय कुशा को हाथ से पकड़े रहें। जप के बाद उसी जल को पी लें इस उपाय के करते ही माइग्रेन, तनाव, अनिद्रा, बेचैनी, घबराहट तथा मृत्यु भय दूर होते हैं।

बृहस्पति ग्रह

बृहस्पति ग्रह गुरु का कारक है। गुरु की सेवा से बृहस्पति को बल मिलता है और मनुष्य की हर प्रकार की समस्याएं हल होती हैं। चने की दाल,बेसन, सोना यह सब बृहस्पति के कारक हैं इन चीजों के दान से बृहस्पति को शक्तिशाली किया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति का बृहस्पति खराब है तो वह गुर्दे की तकलीफ, मधुमेह आदि से ग्रस्त रहता है। 

बृहस्पति : पेट की गैस और फेफड़े की बीमारियां होने लगे तो बृहस्पति का उपचार कराना चाहिए।

गुरु से शरीर का भार, गुर्दे, पित्त तथा पिंडलियां और दोनों कान नियंत्रित होते हैं। गुरु तीसरे और एकादश भाव में स्थित होकर कान के रोग उत्पन्न करता है। राहु के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से युति होने पर यह दोष नहीं होगा। यदि बृहस्पति और शनि परस्पर छठे और आठवें भावों में स्थित हों तो शरीर का भार अधिक बढ़ जाता है और शारीरिक स्फूर्ति क्षीण हो जाती है। चतुर्थेश और दशमेश का स्थान परिवर्तन, चतुर्थ या दशम भाव में गुरु की स्थिति अथवा सप्तम के प्रथम तथा अंतिम द्रेष्काण में गुरु की स्थिति गुर्दे के रोग उत्पन्न करती है। लग्न में सूर्य तथा द्वादश में गुरु पीलिया रोग देते हैं। बृहस्पति के कारण उपजे रोग को दूर करने के लिए हल्दी की माला पर ‘ओम बृहस्पतये नमः’ का एक माला जप रोज सुबह करें।  वाणी दोष की अवस्था में दूध में हल्दी या केसर मिलाकर ‘ओम् चंद्राय नमः, ओम् बृहस्पतये नमः’ मंत्र का जप करके पान करें। किडनी दोष से बचाव के लिए हल्दी की गांठ और स्वर्ण पीले धागे में बांध कर गंगाजल मिले जल में डुबोते हुए छह बार ‘ओम बृहस्पतये नमः’ का जप करके वह जल पी लें। ऐसा 41 दिन तक करें। निश्चित रूप से कल्याण होगा। उसी प्रकार यदि रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो तो हल्दी की गांठ पीले कपड़े में बांधकर हल्दी का स्पर्श शरीर में होता रहे और ‘ओम बृहस्पतये नमः’ मंत्र से धूप दीप आदि से पूजन करके गुरुवार को प्रातः काल दाहिनी भुजा में बांध लें। यह हर तरह से सुखदायी साबित होगा।

शुक्र ग्रह 

शुक्र ग्रह सुन्दरता का प्रतीक है। इसके कारक हैं चांदी, चीनी और सफेद वस्तुएं। अगर शुक्र ग्रह बलशाली है तो जातक सुखमय जिंदगी जीता चला जाएगा। 

कामवासना और इच्छाशक्ति, इसका प्रतिनिधित्व शुक्र ग्रह द्वारा ही किया जाता है। पुरुषों की कुंडली में शुक्र ग्रह को वीर्य का कारक भी माना गया है। इस वजह से यह कहा जाता है कि मानव सृष्टि का विकास शुक्र द्वारा ही संभव है।

शुक्र : त्वचा, दाद, खुजली का रोग।

छठे, सातवें और आठवें भावों में शुक्र की स्थिति या उन पर दृष्टि होने पर शर्करा रोग और गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं। चंद्रमा और शुक्र की युति इन्हीं भावों में हो तो रोग की गंभीरता बढ़ जाती है। शुक्र और गुरु की युति से यह दोष भंग हो जाता है तथा यह शर्करा रोग और नेत्र रोग में परिवर्तित हो जाता है।  द्वितीय और द्वादश स्थान में शुक्र चंद्र या सूर्य के साथ युति करने पर नेत्र दोष उत्पन्न करता है। राहु के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से युति होने पर भी दोष बना रहता है। इन विकारों को दूर करने के लिए कुछ उपाय किया जा सकता है। यौन रोग के लिए शुक्र का समिधा हवन रात्रि में गूलर की लकड़ी से करें। शुगर के लिये शर्करा कुंभ दान करें।

शनि ग्रह

शनि ग्रह कैंसर, दिल से सम्बंधित रोगों का कारक है। शनि से संबंधित वस्तुओं का दान किया जाए तो शनि के दुष्प्रभाव से छुटकारा मिलता चला जाएगा। शनि की कारक वस्तुएं हैं आलू, तेल, लोहा आदि। 

शनि का स्थान नाभि में माना गया है। रमल शास्त्र के अनुसार किसी व्यक्ति के चिंतन की गहराई का आंकलन करने के लिए उसकी कुंडली में शनि की मजबूती देखी जाती है।

शनि : नेत्र रोग और खाँसी की बीमारी।

द्वितीय स्थान में शनि दंत रोग, चतुर्थ स्थान में वायु रोग (गैस्टिक, एसीडिटी) छठे, सातवें, आठवें भावों में घुटनों एवं पिंडलियों में दर्द और दसवें स्थान में तीव्र वायु रोग (उच्च गैस्टिक) उत्पन्न करता है। उपाय: शनिवार की रात्रि में छाया दान 19 शनिवार तक करें। जोड़ों में दर्द से बचाव के लिए शनि की लकड़ी काले कपड़े में बांध कर ‘ओम शनैश्चराय नमः मंत्र से पूजन करके दाहिनी भुजा में बांधें।

राहू और केतु की शांति के लिए सूजी के हलवे और मूली के दान से लाभ मिलता है। 

राहु का स्थान मानव मुख में माना गया है। राहु जिस भाव में बैठा होता है उसी के अनुसार फल देता है। इसके साथ अगर मंगल का तेज मिल जाए तो ऐसा व्यक्ति क्रोधी तो होता है साथ ही उसकी वाणी में वीरता होती है।

राहु : बुखार, दिमागी की खराबियाँ, अचानक चोट, दुर्घटना आदि।

राहु और बुध की अरिष्ट स्थिति (लाभेश से चौथे, छठे, आठवें और बारहवें) से नख तथा बालों के रोग होते हैं। इस दोष में दही का प्रयोग उत्तम रहता है। चौथे, पांचवें या छठे स्थान में राहु हो तो उदर रोग होते हैं और इन्हीं स्थानों पर केतु की स्थिति से अल्सर उत्पन्न होता है। राहु एवं बुध बड़ी तथा छोटी आंत तथा शरीर में बनने वाले सभी हार्मोन नियंत्रित करते हैं। शरीर के नख तथा बाल रोग राहु के के द्वारा नियंत्रित होते हैं और इनका पोषण बुध के द्वारा होता है।  सप्तम में राहु और शुक्र की युति से शीघ्रपतन की बीमारी होती है।

चतुर्थ में क्रूर ग्रह के साथ राहु की युति भी शीघ्रपतन रोग देती है। राहु को शांत करने के लिए भगवान भोले शंकर की पूजा करनी चाहिए। भक्त की पवित्र श्रद्धा पूर्ण आराधना से तत्काल प्रसन्न होने वाले महादेव राहु को शांत कर देते हैं। भगवान शिव की भगवान राम के प्रति अगाध श्रद्धा है, केवल राम नाम के जपने से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं और राहु ग्रह के संकटों से मुक्ति दिला देते हैं। राहु की बड़ी बाधा दूर करने के लिए जातक को शिवपुराण का पाठ करना चाहिए।

केतु

केतु का स्थान कंठ से लेकर हृदय तक होता है। केतु ग्रह का संबंध गुप्त और रहस्यमयी कार्यों से भी होता है।

केतु : रीढ़, जोड़ों का दर्द, शुगर, कान, स्वप्न दोष, हार्निया, गुप्तांग संबंधी रोग आदि।

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana

 

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