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श्रावण महीने का खास महत्व

श्रावण महीने का खास महत्व

 

 

इस साल 2018 में  श्रावण महीने की शुरुआत 27 जुलाई से हो रही है इसे उदया तिथि यानी 28 जुलाई से मानी जाएगी. और 26 अगस्त 2018 को श्रावण मास का आखिरी दिन होगा. 

हिन्दू धर्म में सावन या श्रावण महीने का खास महत्व है. इस महीने में भगवान शंकर की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में सोमवार को व्रत रखने और भगवान शंकर की पूजा करने वाले जातक को मनवांछित जीवनसाथी प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है. विवाहित औरतें यदि श्रावन महीने का सोमवार व्रत रखती हैं तो उन्हें भगवान शंकर सौभाग्य का वरदान देते हैं.

 

बहुत से लोग सावन या श्रावण के महीने में आने वाले पहले सोमवार से ही 16 सोमवार व्रत की शुरुआत करते हैं. सावन महीने की एक बात और खास है कि इस महीने में मंगलवार का व्रत भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के लिए किया जाता है. श्रावण के महीने में किए जाने वाले मंगलवार व्रत को मंगला गौरी व्रत कहा जाता है.

सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए हरिद्वार, देवघर, उज्जैन, नासिक समेत भारत के कई धार्मिक स्थलों पर जाते हैं।

 

इस साल श्रावण मास में 4 सोमवार पड़ेंगे. अगर आप सावन के महीने में सोमवार व्रत रखते हैं तो इस साल आपको सिर्फ चार ही व्रत रखने होंगे.

 

शनिवार, 28 जुलाई श्रावण मास का पहला दिन

सोमवार, 30 जुलाई सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 06 अगस्त सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 13 अगस्त सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 20 अगस्त सावन सोमवार व्रत

रविवार, 26 अगस्त श्रावण मास का अंतिम दिन

 

सावन सोमवार की दिनांक पंश्चिम एवं दक्षिण भारत के लिए

 

रविवार, 12 अगस्त श्रावण मास का पहला दिन

सोमवार, 13 अगस्त सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 20 अगस्त सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 27 अगस्त सावन सोमवार व्रत

सोमवार, 03 सितंबर सावन सोमवार व्रत

रविवार, 09 सितंबर श्रावण मास का अंतिम दिन

 

व्रत और पूजा विधि

 

1. प्रातः सूर्योदय से पहले जागें और शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करें

2. पूजा स्थल को स्वच्छ कर वेदी स्थापित करें

3. शिव मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग को दूध चढ़ाएँ

4. फिर पूरी श्रद्धा के साथ महादेव के व्रत का संकल्प लें

5.  दिन में दो बार (सुबह और सायं) भगवान शिव की प्रार्थना करें

6. पूजा के लिए तिल के तैल का दीया जलाएँ और भगवान शिव को पुष्प अर्पण करें

7.  मंत्रोच्चार सहित शिव को सुपारी, पंच अमृत, नारियल एवं बेल की पत्तियाँ चढ़ाएँ

8. व्रत के दौरान सावन व्रत कथा का पाठ अवश्य करें

9. पूजा समाप्त होते ही प्रसाद का वितरण करें

10. संध्याकाल में पूजा समाप्ति के बाद व्रत खोलें और सामान्य भोजन करें

 

मंत्र:- ओम् नमः शिवाय का जाप करें।

 

सावन कथा

 

प्राचीन काल में एक धनी व्यक्ति था, जिसके पास सभी प्रकार की धन-दौलत एवं शौहरत थी, लेकिन दुर्भाग्य यह था कि उस व्यक्ति की कोई संतान न थी। इस बात का दुःख उसे हमेशा सताता था, लेकिन वह और उसकी पत्नी दोनों शिव भक्त थे। दोनों ही भगवान शिव की आराधना में सोमवार को व्रत रखने लगे। उनकी सच्ची भक्ति को देखकर माँ पार्वती ने शिव भगवान से उन दोनों दंपति की सूनी गोद को भरने का आग्रह किया। परिणाम स्वरूप शिव के आशीर्वाद से उनके घर में पुत्र ने जन्म लिया, लेकिन बालक के जन्म के साथ ही एक आकाशवाणी हुई, यह बालक अल्पायु का होगा। 12 साल की आयु में इस बालक की मृत्यु हो जाएगी। इस भविष्यकथन के साथ उस व्यक्ति को पुत्र प्राप्ति की अधिक ख़ुशी न थी। उसने अपने बालक का नाम अमर रखा।

 

जैसे-जैसे अमर थोड़ा बड़ा हुआ, उस धनी व्यक्ति ने उसको शिक्षा के लिए काशी भेजना उचित समझा। उसने अपने साले को अमर के साथ काशी भेजने का निश्चय किया। अमर अपने मामा जी के साथ काशी की ओर चल दिए। रास्ते में उन्होंने जहाँ-जहाँ विश्राम किया वहाँ-वहाँ उन्होंने ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी। चलते-चलते वे एक नगर में पहुँच गए। जहाँ पर एक राजकुमारी के विवाह का समारोह हो रहा था। उस राजकुमारी का दूल्हा एक आँख से काना था, यह बात दूल्हे के परिवार वालों ने राज परिवार से छिपाकर रखी थी। उन्हें इस बात का डर था कि यह बात अगर राजा को पता चल गई तो यह शादी नहीं होगी। इसलिए दूल्हे के घर वालों ने अमर से झूठमूठ का दूल्हा बनने का आग्रह किया और वह उनके आग्रह को मना न कर सका। इस प्रकार उस राजकुमारी के साथ अमर की शादी हो गई, लेकिन वह उस राजकुमारी को धोखे में नहीं रखना चाहता था। इसलिए उसने राजकुमारी की चुनरी में इस घटनाक्रम की पूरी सच्चाई लिख दी। राजकुमारी ने जब अमर के उस संदेश को पढ़ा, तब उसने अमर को ही अपना पति माना और काशी से वापस लौटने तक उसका इंतज़ार करने को कहा। अमर और उसके मामा वहाँ से काशी की ओर चल दिए।

 

समय का पहिया आगे बढ़ता रहा। उधर, अमर हमेशा धार्मिक कार्यों में लगा रहता था। जब अमर ठीक 12 साल का हुआ, तब वह शिव मंदिर में भोले बाबा को बेल पत्तियाँ चढ़ा रहा था। उसी समय वहाँ यमराज उसके प्राण लेने पधार गए, लेकिन इससे पहले भगवान शिव ने अमर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु का वरदान दे दिया था। परिणाम स्वरूप यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा। बाद में अमर काशी से शिक्षा प्राप्त करके अपनी पत्नी (राजकुमारी) के साथ घर लौटा।

 

Astrologer Kanchan Pardeep Kukreja

Divya Jyoti Astro and Vaastu,

Abohar & Ludhiana